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⚖️ हाई कोर्ट 📅 23 अक्टूबर 2026 ⏱ 6 मिनट में पढ़ें

सोशल मीडिया पोस्ट और गिरफ्तारी पर कर्नाटक हाई कोर्ट के दिशा-निर्देश

कर्नाटक हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट पर एफआईआर रद्द की और पुलिस को मनमानी गिरफ्तारी व बिना जांच केस दर्ज करने को लेकर सख्त निर्देश दिए।

⚡ त्वरित सारांश

कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक प्रकाशित खबर को सोशल मीडिया पर केवल साझा करने वाले अकाउंट एडमिनिस्ट्रेटर के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस रद्द कर दिया है। पुलिस अधिकारियों के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश तय करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक ही ऑनलाइन पोस्ट पर कई एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकतीं और किसी की भी गिरफ्तारी यूं ही यांत्रिक तरीके से नहीं होनी चाहिए।

📌 मुख्य बातें

  1. पुलिस बिना सोचे-समझे या बिना जांच किए ऑनलाइन पोस्ट पर केस दर्ज या गिरफ्तारी नहीं कर सकती।
  2. एक ही घटना या पोस्ट को लेकर अलग-अलग शिकायतों पर कई एफआईआर दर्ज करने की अनुमति नहीं है।
  3. अधिकारियों को अपराध की जरूरी कानूनी शर्तें परखनी होंगी और प्रक्रिया संहिता के सुरक्षा नियमों का पालन करना होगा।

📋 केस एक नज़र में

अदालतकर्नाटक हाई कोर्ट
बेंचजस्टिस एम नागप्रसन्ना
केसSandeep Kumar v. State of Karnataka (context of Karnataka Portfolio account)
तारीख2026-10-23
कानून / मुद्दाBNS की धारा 353(2); BNSS की धारा 35 और धारा 173(3)

नागरिकों को पुलिस की मनमानी कार्रवाई से सुरक्षा देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के एडमिनिस्ट्रेटर पर दर्ज आपराधिक मामला रद्द (Quashed) कर दिया। जस्टिस एम नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने पुलिस की उस बढ़ती आदत पर सवाल उठाया, जिसमें बिना यह जांचे ही एफआईआर (First Information Report) दर्ज कर ली जाती है कि कोई अपराध बना भी है या नहीं। कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस की जल्दबाजी वाली कार्रवाई से नागरिकों की संवैधानिक आजादी नहीं छीनी जा सकती।

यह फैसला इंटरनेट पर खबरें साझा करने या राय रखने वाले नागरिकों के खिलाफ कानूनी धाराओं के दुरुपयोग को रोकता है। कर्नाटक भर की पुलिस को अनिवार्य दिशा-निर्देश देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट यानी प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने का मतलब यह कतई नहीं है कि व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाए या उसे परेशान किया जाए।

पृष्ठभूमि

यह मामला जुलाई 2026 का है, जब पुत्तूर में एक एसयूवी सवार छह युवकों द्वारा एक महिला का पीछा करने, उसे चाकू दिखाकर धमकाने और छेड़छाड़ (Stalking) करने की घटना सामने आई थी। यह पूरी घटना सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई थी और मीडिया में इसकी व्यापक चर्चा हुई थी। 'कर्नाटक पोर्टफोलियो' नाम के एक्स (पहले ट्विटर) अकाउंट के एडमिनिस्ट्रेटर संदीप कुमार ने भी इसी प्रकाशित खबर की एक रिपोर्ट शेयर की।

उनकी पोस्ट में घटना का विवरण था और बताया गया था कि महिला को चाकू से धमकाने के आरोप में छह लोगों को हिरासत में लिया गया है। बाद में, पीछा करने के आरोपी युवकों में से एक ने शिकायत दर्ज करा दी कि इस ऑनलाइन पोस्ट में झूठे दावे किए गए हैं, जिससे सांप्रदायिक तनाव भड़क सकता है। इस शिकायत पर पुत्तूर टाउन पुलिस ने सार्वजनिक शरारत भड़काने वाले बयानों के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) के तहत केस दर्ज कर लिया।

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर केस को चुनौती दी और बताया कि इसी एक घटना को लेकर अलग-अलग लोगों और मीडिया आउटलेट्स पर सात अलग-अलग मामले दर्ज किए गए हैं। एडमिनिस्ट्रेटर के वकील गिरीश भारद्वाज ने दलील दी कि याचिकाकर्ता ने केवल पहले से सार्वजनिक और सत्यापित खबर को फिर से साझा किया था, वे इस खबर के लेखक नहीं थे और न ही किसी खास वर्ग को निशाना बनाया गया था। वहीं सरकारी वकील का कहना था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिए गए थे और पोस्ट से सामाजिक शांति प्रभावित हुई थी।

कोर्ट ने क्या कहा

जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने बिना स्वतंत्र जांच के एक ही घटना पर बार-बार मामले दर्ज करने पर संबंधित पुलिस की कड़ी खिंचाई की। कोर्ट ने माना कि महिला का पीछा करना और चाकू दिखाना एक गंभीर घटना थी, और फिर यह सवाल उठाया कि ऐसी घटना की सार्वजनिक रिपोर्टिंग को अपराध की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है।

“...यह हैरान करने वाला है कि किसी के केवल कह देने पर ही संबंधित पुलिस एक ही घटना को लेकर बिना अपराध के जरूरी तत्व देखे कैसे मामले दर्ज कर लेती है...”

अदालत ने कहा कि पुलिस का यह रवैया सतेंद्र कुमार अंतिल, नल्ला बालू और अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य जैसे मील के पत्थर फैसलों में तय किए गए न्यायिक मानकों का उल्लंघन करता है। मनमानी रोकने के लिए हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में पुलिस के लिए विस्तृत निर्देश तय किए। पहला, अधिकारियों को सिर्फ धाराओं की नकल करने के बजाय अपराध के आवश्यक तत्वों की बारीकी से जांच करनी होगी।

दूसरा, जब एक ही घटना या पोस्ट पर कई शिकायतें आएं, तो पुलिस को यह जांचना होगा कि क्या पहले से ही कोई जांच चल रही है, न कि हर नए शिकायतकर्ता के आने पर अलग एफआईआर दर्ज की जाए। तीसरा, जहां मुमकिन हो, पुलिस सीधे केस दर्ज करने के बजाय BNSS की धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) का सहारा ले। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि BNS की धारा 353(2) के लिए किसी खास समूह को निशाना बनाने की दुर्भावना होना जरूरी है; इसे सामान्य रिपोर्टिंग पर लागू नहीं किया जा सकता। अंत में, कोर्ट ने याद दिलाया कि सिर्फ केस दर्ज होने से पुलिस को मनमानी गिरफ्तारी (Arrest) का हक नहीं मिल जाता, और BNSS की धारा 35 का कड़ाई से पालन होना चाहिए।

कानून आसान भाषा में

BNS की धारा 353(2) उन बयानों, अफवाहों या खबरों को छापने, प्रसारित करने या फैलाने पर रोक लगाती है जिनका मकसद अलग-अलग वर्गों या समुदायों के बीच नफरत, शत्रुता या दुर्भावना पैदा करना हो। कोर्ट ने साफ किया कि सामान्य आलोचना, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग या पुरानी खबर को री-शेयर करना इस धारा में अपराध नहीं बनता, जब तक कि शांति भंग करने की जानबूझकर की गई दुर्भावना साबित न हो।

प्रक्रिया के लिहाज से, BNSS की धारा 35 पुलिस की मनमानी हिरासत पर लगाम लगाती है और उन स्पष्ट शर्तों को तय करती है जिनके तहत ही किसी आरोपी को गिरफ्तार किया जा सकता है, खासकर ऐसे मामलों में जहां कड़ी सजा का प्रावधान नहीं है। इसके अलावा, BNSS की धारा 173(3) पुलिस को औपचारिक एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच की सुविधा देती है। हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ये नियम इसलिए बनाए गए हैं ताकि कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल लोगों को डराने-धमकाने के लिए न किया जाए।

आम लोगों पर असर

यह फैसला आम सोशल मीडिया यूजर्स, पत्रकारों और पेज एडमिनिस्ट्रेटर्स के लिए एक बड़ा कानूनी कवच है। अक्सर लोग सिर्फ कोई सच्ची घटना शेयर करने या सुरक्षा से जुड़े मामलों पर टिप्पणी करने की वजह से कानूनी पचड़ों में फंस जाते हैं। कोर्ट के इन निर्देशों से यह सुनिश्चित होगा कि किसी असरदार व्यक्ति या आरोपी के शिकायत कर देने भर से किसी आम नागरिक को अचानक गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा।

इसके अलावा, एक ही पोस्ट के लिए अलग-अलग थानों में बार-बार मुकदमे दर्ज करने पर रोक लगने से नागरिकों को कई जगहों पर समानांतर मुकदमों की दौड़-भाग से राहत मिलेगी। राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया है कि वे इन नियमों को हर थाने तक पहुंचाएं, जिससे पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही तय हो सके।

ऐसी स्थिति में क्या करें

  • अपने डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखें, जिसमें मूल पोस्ट, तारीख, समय और खबर का स्रोत स्पष्ट दिख रहा हो।
  • अगर पुलिस संपर्क करती है या BNSS की धारा 35 के तहत कोई नोटिस मिलता है, तो उसे नजरअंदाज न करें और फौरन कानूनी सलाह लें।
  • बिना पुष्टि किए कोई भी ऐसी बात न लिखें या फैलाएं जिससे तनाव फैलने का अंदेशा हो।
  • अगर एक ही पोस्ट को लेकर शिकायत हो, तो पता करें कि क्या पहले से कोई केस दर्ज है, क्योंकि एक ही मामले में कई एफआईआर दर्ज नहीं हो सकतीं।
  • यदि एफआईआर में अपराध का कोई बुनियादी आधार नहीं दिखता है, तो अपने वकील के जरिए सीधे हाई कोर्ट में केस रद्द (Quashing) कराने की अर्जी लगाएं।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या किसी ऑनलाइन पोस्ट पर एफआईआर दर्ज होते ही पुलिस तुरंत गिरफ्तार कर सकती है?

नहीं, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल एफआईआर दर्ज होने से गिरफ्तारी अपने आप नहीं हो जाती। पुलिस को BNSS की धारा 35 और तय न्यायिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

क्या एक ही सोशल मीडिया पोस्ट पर अलग-अलग लोग कई एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं?

नहीं, कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पुलिस पहले जांचे कि क्या उस पोस्ट पर पहले से केस दर्ज है। सिर्फ नए शिकायतकर्ता के आने पर एक ही बात के लिए बार-बार एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती।

क्या पहले से छपी खबर को केवल शेयर करने पर भी आपराधिक केस बन सकता है?

किसी छपी हुई खबर को बिना किसी दुर्भावना के केवल री-पोस्ट करने पर BNS की धारा 353(2) के तहत अपराध नहीं बनता। इसके लिए समाज में नफरत फैलाने की दुर्भावना का होना जरूरी है।

सोशल मीडिया से जुड़ी शिकायत मिलने पर पुलिस को पहले क्या कदम उठाना चाहिए?

पुलिस को पहले यह देखना चाहिए कि क्या शिकायत में कानूनी तौर पर अपराध बनता भी है या नहीं। आवश्यकता पड़ने पर वे BNSS की धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जांच भी कर सकते हैं।

📖 कानूनी शब्दों के मतलब

Quashed (रद्द करना)अदालत द्वारा किसी कानूनी प्रक्रिया या एफआईआर को अमान्य घोषित कर पूरी तरह समाप्त कर देना।
FIR (प्रथम सूचना रिपोर्ट)किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर पुलिस द्वारा लिखित रूप में तैयार किया जाने वाला आधिकारिक दस्तावेज।
Preliminary Inquiry (प्रारंभिक जांच)केस दर्ज करने से पहले पुलिस द्वारा की जाने वाली प्राथमिक जांच, जिससे यह पता चले कि आरोप में कोई दम है या नहीं।
BNS (भारतीय न्याय संहिता)भारत का मुख्य आपराधिक कानून, जो विभिन्न अपराधों और उनकी सजाओं की परिभाषा तय करता है।
BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता)भारत में आपराधिक मामलों की जांच, अदालती प्रक्रिया और गिरफ्तारी से जुड़े नियमों को तय करने वाला कानून।
⚠️ यह लेख एक सरल सारांश है, केवल सामान्य जानकारी के लिए। इसे कानूनी सलाह न समझें — अपने मामले के लिए वकील से सलाह लें।
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