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⚖️ सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया 📅 19 अक्टूबर 2026 ⏱ 5 मिनट में पढ़ें

आंध्र निकाय चुनाव: नामांकन में हिंसा के आरोप पर YSRCP पहुंची सुप्रीम कोर्ट

आंध्र प्रदेश निकाय चुनाव में हिंसा और नामांकन की तारीख न बढ़ने पर YSRCP ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने दखल से किया था इनकार।

⚡ त्वरित सारांश

युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) ने आंध्र प्रदेश के शहरी निकाय चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। पार्टी का आरोप है कि 16 से 18 अक्टूबर के बीच भारी हिंसा के कारण उसके उम्मीदवार नामांकन पत्र दाखिल नहीं कर सके। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा नामांकन की समयसीमा बढ़ाने से इनकार करने के बाद पार्टी ने शीर्ष अदालत का रुख किया है।

📌 मुख्य बातें

  1. YSRCP ने आंध्र प्रदेश निकाय चुनाव में नामांकन की तारीख बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
  2. पार्टी ने हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें खत्म हो चुके चुनावी कार्यक्रम को बदलने से इनकार कर दिया गया था।
  3. पार्टी का आरोप है कि कई इलाकों में उसके प्रत्याशियों के साथ मारपीट की गई और नामांकन दाखिल करने से रोका गया।

📋 केस एक नज़र में

अदालतसुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India)
केसLella Appireddy v. State Election Commission & Ors.
तारीख2026-10-19
कानून / मुद्दाविशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition), शहरी स्थानीय निकाय चुनाव, चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप

युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) ने आंध्र प्रदेश शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवारों के नामांकन को लेकर आ रही दिक्कतों के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। राजनीतिक दल ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के 18 अक्टूबर के आदेश को चुनौती देते हुए एक विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) दायर की है। हाई कोर्ट ने नामांकन की समयसीमा बढ़ाने की मांग वाली अर्जी खारिज कर दी थी।

यह कानूनी मामला एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि संवैधानिक अदालतें चुनाव प्रक्रिया के दौरान गैर-हस्तक्षेप के नियम और हिंसा के गंभीर आरोपों के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं—खासकर तब जब उम्मीदवारों को पर्चा दाखिल करने से ही रोक दिया गया हो। पार्टी ने शीर्ष अदालत से पुलिस सुरक्षा देने, अतिरिक्त नामांकन केंद्र बनाने और विवादित वार्डों में उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करने पर रोक लगाने की मांग की है।

पृष्ठभूमि

आंध्र प्रदेश में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन प्रक्रिया 16 अक्टूबर से शुरू होकर 18 अक्टूबर को समाप्त होनी तय थी। पार्टी ने व्यापक अशांति और रुकावट की आशंका जताते हुए पहले ही हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और जिला मुख्यालयों पर अतिरिक्त नामांकन केंद्रों की मांग की थी। 15 अक्टूबर को एकल पीठ (Single Judge) ने सामूहिक राहत देने से इनकार करते हुए व्यक्तिगत उम्मीदवारों को संबंधित चुनाव अधिकारियों के पास जाने का निर्देश दिया था।

पार्टी का दावा है कि नामांकन शुरू होते ही पुंगनूर, रायचोटी, कडप्पा और तिरुपति समेत कई इलाकों में गंभीर शारीरिक हिंसा, धमकियां और रुकावटें डाली गईं। पार्टी महासचिव लेल्ला अप्पीरेड्डी के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया कि कडप्पा में एक उम्मीदवार के नामांकन दस्तावेज छीनकर फाड़ दिए गए। इसके अलावा, तिरुपति नगर निगम चुनाव के नौ संभावित उम्मीदवारों को रिटर्निंग ऑफिसर (Returning Officer) के कार्यालय में घुसने से जबरन रोका गया।

याचिका में सांसद पी.वी. मिधुन रेड्डी के काफिले पर कथित हमले का भी जिक्र किया गया, जो उम्मीदवारों को पर्चा दाखिल कराने में मदद करने जा रहे थे। हालांकि शिकायतों के बाद राज्य चुनाव आयोग ने नामांकन केंद्रों पर सुरक्षा व्यवस्था के आदेश दिए, लेकिन समयसीमा आगे नहीं बढ़ाई। इसके बाद पार्टी ने हाई कोर्ट का रुख किया, जिसने नामांकन का समय समाप्त होने के बाद हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने क्या कहा

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 18 अक्टूबर के अपने फैसले में नामांकन दाखिल करने के लिए एक दिन का अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने अर्जी मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज की कि तय समयसीमा पहले ही खत्म हो चुकी थी। कोर्ट का मानना था कि उस चरण में कोई भी छूट देने से जारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित होगी।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि तय समयसीमा को बढ़ाना:

चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के बराबर होगा।

इस आदेश से असंतुष्ट होकर पार्टी ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड महफूज ए. नाज़की के जरिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि चुनाव में न्यायिक गैर-हस्तक्षेप का पारंपरिक नियम केवल न्यायिक संयम (Judicial Restraint) का हिस्सा है, कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं। पार्टी का कहना है कि जब उम्मीदवारों को गैरकानूनी तरीके से शारीरिक रूप से रोका गया हो, तो समयसीमा समाप्त होना राहत देने में आड़े नहीं आना चाहिए।

कानून आसान भाषा में

भारतीय चुनाव कानून के तहत, एक बार चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद संवैधानिक अदालतें आमतौर पर दखल देने से बचती हैं। सामान्य नियम यह है कि पीड़ित पक्ष चुनाव संपन्न होने का इंतजार करे और उसके बाद नतीजों को चुनौती देने के लिए संबंधित अदालत में चुनाव याचिका (Election Petition) दायर करे।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह याचिका इस सिद्धांत के दायरे की परख करती है। पार्टी का तर्क है कि संवैधानिक अदालतों के पास ऐसे आदेश देने का अधिकार है जो चुनावों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करें, खासकर तब जब शारीरिक धमकियों से मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा हो। इस रुख के अनुसार, जब उम्मीदवारों को जबरन रोका जा रहा हो, तो अदालतों को मूकदर्शक बनने के बजाय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नामांकन प्रक्रिया वास्तव में सुलभ रहे।

याचिका में प्रभावित वार्डों में उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करने पर रोक लगाने की भी मांग की गई है। जब विपक्षी उम्मीदवारों को पर्चा दाखिल करने से रोक दिया जाता है, तो सीटें अक्सर निर्विरोध हो जाती हैं और बिना मुकाबले के जीत मिल जाती है। याचिका का तर्क है कि अगर उम्मीदवारों को जबरन रोका गया था, तो ऐसे परिणाम निष्पक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था को चोट पहुंचाते हैं।

आम लोगों पर असर

यह मामला सीधे तौर पर स्थानीय स्वशासन और आंध्र प्रदेश की नगर पालिकाओं में रहने वाले आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा है। जब उम्मीदवारों को हिंसा का सामना करना पड़ता है या सरकारी चुनाव कार्यालयों में जाने से रोका जाता है, तो अंततः मतदाता मतपेटी में अपने वास्तविक लोकतांत्रिक विकल्प से वंचित हो जाते हैं।

शहरी स्थानीय निकाय सड़क, सफाई, पानी की आपूर्ति और नागरिक प्रशासन जैसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाएं संभालते हैं। जब हर योग्य राजनीतिक प्रतिनिधि बिना किसी डर के नामांकन दाखिल कर पाता है, तभी स्थानीय प्रशासन में बाहुबल के बजाय जनता की सच्ची इच्छा की झलक मिलती है।

स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए यह मामला यह साफ करता है कि जब स्थानीय प्रशासनिक तंत्र और पुलिस निष्पक्ष नामांकन प्रक्रिया सुनिश्चित करने में विफल हो जाएं, तो कानूनी तौर पर कौन से रास्ते उपलब्ध हैं।

ऐसी स्थिति में क्या करें

  • घटना के तुरंत बाद पुख्ता सबूत जुटाएं, जैसे वीडियो फुटेज, पुलिस शिकायतें और स्थानीय रिटर्निंग ऑफिसर को दिए गए लिखित आवेदन।
  • रुकावट या उत्पीड़न की हर घटना का ब्योरा देते हुए राज्य चुनाव आयोग को तुरंत औपचारिक नोटिस और लिखित शिकायत भेजें।
  • सुरक्षा या वैकल्पिक नामांकन केंद्रों की मांग को लेकर नामांकन की समयसीमा खत्म होने से पहले ही बिना देरी किए संबंधित हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं।
  • अस्वीकार किए गए सभी फॉर्मों, लिखित पावतियों (acknowledgments) और चुनाव अधिकारियों से हुए पत्राचार की प्रमाणित प्रतियां संभालकर रखें।
  • चुनाव मामलों के अनुभवी वकीलों से कानूनी सलाह लें कि तुरंत रिट याचिका (Writ Petition) दायर करनी चाहिए या चुनाव के बाद चुनाव याचिका (Election Petition) दाखिल करना सही रहेगा।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हाई कोर्ट ने YSRCP की अर्जी क्यों खारिज कर दी थी?

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अर्जी इसलिए खारिज की क्योंकि नामांकन की तय समयसीमा खत्म हो चुकी थी। अदालत का मानना था कि उस समय अवधि बढ़ाना चल रही चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जाएगा।

YSRCP ने सुप्रीम कोर्ट से क्या राहत मांगी है?

पार्टी ने नामांकन की समयसीमा बढ़ाने, अतिरिक्त नामांकन केंद्र बनाने और उम्मीदवारों को पुलिस सुरक्षा देने की मांग की है। साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करने पर रोक लगाने की अपील की है।

याचिका में हिंसा की किन घटनाओं का आरोप लगाया गया है?

याचिका में आरोप है कि पुंगनूर, रायचोटी, कडप्पा और तिरुपति में उम्मीदवारों के साथ मारपीट की गई, उन्हें धमकाया गया या रोका गया। विशेष रूप से कडप्पा में नामांकन पत्र फाड़े जाने और सांसद पी.वी. मिधुन रेड्डी के काफिले पर हमले का उल्लेख है।

क्या चुनाव प्रक्रिया के दौरान संवैधानिक अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं?

आमतौर पर अदालतें न्यायिक संयम बरतते हुए चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं देती हैं। हालांकि, याचिका में तर्क दिया गया है कि जब उम्मीदवारों को जबरन रोका जा रहा हो, तो चुनाव को निष्पक्ष बनाने में सहायता के लिए अदालतें जरूरी निर्देश दे सकती हैं।

📖 कानूनी शब्दों के मतलब

Special Leave Petition (विशेष अनुमति याचिका)सुप्रीम कोर्ट में निचली अदालत के किसी फैसले या आदेश को चुनौती देने के लिए विशेष अनुमति मांगने वाली याचिका।
Returning Officer (रिटर्निंग ऑफिसर / निर्वाचन अधिकारी)चुनावी क्षेत्र में चुनाव के संचालन, नामांकन पत्रों को स्वीकार करने और उनकी जांच करने के लिए जिम्मेदार अधिकृत सरकारी अधिकारी।
Election Petition (चुनाव याचिका)मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव परिणामों की वैधता को चुनौती देने के लिए अदालत में दायर की जाने वाली कानूनी याचिका।
Judicial Restraint (न्यायिक संयम)एक कानूनी सिद्धांत जिसके तहत अदालतें अपनी शक्तियों के इस्तेमाल में संयम बरतती हैं और चुनावी या प्रशासनिक कार्यक्रमों में सीधे दखल से बचती हैं।
⚠️ यह लेख एक सरल सारांश है, केवल सामान्य जानकारी के लिए। इसे कानूनी सलाह न समझें — अपने मामले के लिए वकील से सलाह लें।
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