⚡ त्वरित सारांश
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को सलाह दी है कि पटाखा-मुक्त दिवाली को बढ़ावा देने के लिए विराट कोहली जैसे मशहूर खिलाड़ियों की मदद से जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएं। कोर्ट ने जनस्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए दोहराया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे में आता है, और वायु प्रदूषण के नुकसान को लेकर बच्चों को जागरूक करना जरूरी है।
📌 मुख्य बातें
- कोर्ट ने स्वच्छ दिवाली को बढ़ावा देने के लिए विराट कोहली जैसी मशहूर हस्तियों को जोड़ने का सुझाव दिया।
- अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता जनस्वास्थ्य और अन्य बुनियादी अधिकारों के अधीन है।
- समाज की सोच बदलने के लिए बच्चों और स्कूलों को इस मुहिम से सक्रिय रूप से जोड़ा जाना चाहिए।
📋 केस एक नज़र में
| अदालत | सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) |
|---|---|
| बेंच | जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले |
| तारीख | 2026-10-29 |
| कानून / मुद्दा | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25; वायु प्रदूषण नियंत्रण नियम |
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली के अधिकारियों को सुझाव दिया है कि नागरिकों को बिना पटाखों के दिवाली मनाने के लिए प्रेरित करने हेतु जानी-मानी हस्तियों के प्रभाव का इस्तेमाल किया जाए। अदालत ने कहा कि क्रिकेटर विराट कोहली जैसे सम्मानित प्रतीकों की मदद से जागरूकता संदेश तैयार किए जाएं, जिससे त्योहार की खुशियां भी बनी रहें और जनस्वास्थ्य की रक्षा भी हो सके।
यह सुझाव दिल्ली-एनसीआर में खतरनाक स्तर पर पहुंचे वायु प्रदूषण को लेकर चल रही अदालती सुनवाई के दौरान सामने आया। कोर्ट ने कहा कि सर्दियों के त्योहारों के दौरान पर्यावरण को गंभीर नुकसान से बचाने के लिए डिजिटल, प्रिंट और टीवी चैनलों के जरिए बड़े पैमाने पर जन-जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है।
पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई दिल्ली-एनसीआर में लगातार बिगड़ती हवा की गुणवत्ता को लेकर दायर व्यापक याचिकाओं का हिस्सा है। सर्दियों की शुरुआत और त्योहारों के समय बढ़ने वाला वायु प्रदूषण स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाता है।
सुनवाई के दौरान, न्यायमित्र (Amicus Curiae) ने महीन कणों यानी पार्टिकुलेट मैटर से होने वाले जानलेवा नुकसान से जुड़े आंकड़े पेश किए। 'स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025' रिपोर्ट का हवाला देते हुए न्यायमित्र ने बताया कि भारत में मौतों के लिए वायु प्रदूषण सबसे बड़ा जोखिम कारक बन चुका है, जो 20.1 लाख से अधिक मौतों से जुड़ा है, जिनमें 21 प्रतिशत बच्चे पांच साल से कम उम्र के थे।
न्यायमित्र ने यह भी रेखांकित किया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों की तुलना में दिल्ली-एनसीआर के लोगों की जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) औसतन 8.2 साल कम हो रही है, जबकि एक अन्य अनुमान के अनुसार लगातार रहने वाले प्रदूषण के कारण 4.74 साल की कमी आ रही है। इन गंभीर आंकड़ों ने सख्त और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत साफ कर दी।
कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने कहा कि त्योहार ऐसे मनाए जाने चाहिए जिससे दूसरों को कोई दुख या परेशानी न हो। जस्टिस वराले ने सवाल किया कि अधिकारी लोगों के व्यवहार को बदलने के लिए सम्मानित खिलाड़ियों और प्रमुख हस्तियों की साख का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे हैं।
ठोस सुझाव देते हुए जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि विराट कोहली जैसी हस्तियों को जनता से सीधे अपील करने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने त्योहारों के ऐतिहासिक पहलुओं का जिक्र करते हुए कहा कि बारूद और आतिशबाजी रोशनी के इस त्योहार के मूल हिस्से नहीं थे, बल्कि ये बाद में जुड़े हैं।
"जनता में जागरूकता पैदा करने के लिए आप जाने-माने खिलाड़ियों या बेहद सम्मानित मशहूर हस्तियों की सेवाओं का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते..."
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण में छोटे बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों, बीमार लोगों और यहां तक कि पशु-पक्षियों की भलाई का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। अदालत ने हालात बिगड़ने की आशंका से उस समय पूर्ण प्रतिबंध का आदेश तो नहीं दिया, लेकिन अधिकारियों को कड़ी चेतावनी दी कि अगर मौजूदा नियमों को लागू नहीं किया गया, तो न्यायपालिका को बेहद सख्त रुख अपनाना पड़ेगा।
जजों ने शिक्षा अधिकारियों को भी निर्देश देने की वकालत की ताकि स्कूली बच्चों को जागरूक किया जा सके, क्योंकि युवा पीढ़ी बदलाव को जल्दी अपनाती है और वे अपने परिवारों को भी हानिकारक प्रथाओं को छोड़ने के लिए मना सकते हैं।
कानून आसान भाषा में
इस मामले में पीठ के सामने मुख्य कानूनी सवाल व्यक्तिगत आस्था और समाज की भलाई के बीच संवैधानिक संतुलन का था। भारतीय संविधान के तहत बुनियादी अधिकार इस तरह बनाए गए हैं कि वे समाज की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाए बिना साथ-साथ चल सकें।
अदालत ने विशेष रूप से अनुच्छेद 25 का जिक्र किया, जो अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। हालांकि, यह संवैधानिक गारंटी पूरी तरह से सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, जनस्वास्थ्य और संविधान के भाग III में दिए गए अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है।
लिहाजा, पीठ ने कहा कि यदि कोई धार्मिक परंपरा सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य और पर्यावरण को खतरे में डालती है, तो उसे पूर्ण संवैधानिक छूट नहीं मिल सकती। जब जहरीला प्रदूषण इंसानी जिंदगी को खतरे में डालता है, तो सार्वजनिक सुरक्षा और जीवन के मौलिक अधिकार के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
आम लोगों पर असर
इस अदालती रुख का सीधा असर दिल्ली-एनसीआर के उन निवासियों पर पड़ता है जो हर सर्दी में दमघोंटू धुंध और सांस की बीमारियों से जूझते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों की परेशानी को सामने रखकर कोर्ट ने सांस लेने योग्य स्वच्छ हवा की बुनियादी जरूरत पर जोर दिया है।
आम नागरिकों के लिए यह संदेश ध्वनि और रासायनिक पटाखों की जगह मिलकर त्योहार मनाने की स्वस्थ परंपरा की ओर बढ़ने का है। सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय, अदालत ने शिक्षा और सामाजिक समझ पर जोर दिया है, ताकि बच्चे अपने घरों में बदलाव ला सकें।
साथ ही, कोर्ट ने जांच और प्रवर्तन एजेंसियों को मौजूदा पाबंदियों को सख्ती से लागू करने की चेतावनी दी है, ताकि ढिलाई बरतने पर भविष्य में और कड़े न्यायिक आदेशों का सामना न करना पड़े।
ऐसी स्थिति में क्या करें
- अपने इलाके में पर्यावरण नियमों के उल्लंघन, जैसे प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री या अवैध आतिशबाजी का पूरा ब्योरा रखें।
- ऐसी घटनाओं की समय रहते संबंधित नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराएं।
- गंभीर प्रदूषण के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की मांग करते समय तस्वीरें, तारीख और जरूरी कागजी सबूत सुरक्षित रखें।
- यदि संबंधित अधिकारी पर्यावरण सुरक्षा नियमों को लागू करने में विफल रहते हैं, तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर करने के लिए किसी योग्य वकील से कानूनी सलाह लें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली अभियान के लिए मशहूर हस्तियों की मदद लेने का सुझाव क्यों दिया?
कोर्ट का मानना है कि क्रिकेटर विराट कोहली जैसी सम्मानित हस्तियों का जनता पर गहरा प्रभाव होता है। उनके संदेश नागरिकों को बिना पटाखों के दिवाली मनाने और प्रदूषण रोकने के लिए प्रभावी ढंग से प्रेरित कर सकते हैं।
क्या अनुच्छेद 25 त्योहारों पर बिना रोक-टोक पटाखे जलाने की अनुमति देता है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता जनस्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है। इसलिए जनस्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर नियम तय किए जा सकते हैं।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया?
कोर्ट ने उस समय पूरी तरह से पाबंदी लगाने से परहेज किया, लेकिन अधिकारियों को मौजूदा नियमों का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि लापरवाही होने पर सख्त कदम उठाए जाएंगे।
कोर्ट ने प्रदूषण रोकने के लिए बच्चों को जोड़ने का क्या तरीका बताया?
पीठ ने शिक्षा विभाग को निर्देश देने का सुझाव दिया ताकि छात्रों को पटाखों के नुकसान बताए जा सकें। बच्चे नई बातों को जल्दी सीखते हैं और वे अपने परिवारों को भी पटाखे न जलाने के लिए समझा सकते हैं।