⚡ त्वरित सारांश
सुप्रीम कोर्ट ने एक गर्भवती पत्रकार द्वारा दायर अर्जी पर नोटिस जारी किया है। पत्रकार का आरोप है कि कोर्ट गेट के बाहर उन्हें विपक्षी नेता राहुल गांधी ने धक्का दिया था। अर्जी में आपराधिक मामला दर्ज करने, इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा सबूतों को सुरक्षित रखने और सुरक्षा निर्देश जारी करने की मांग की गई है। यह अर्जी सुप्रीम कोर्ट परिसर में राजनीतिक प्रदर्शनों से संबंधित एक बड़ी याचिका में हस्तक्षेप के तौर पर आई है।
📌 मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ FIR की मांग करने वाली एक पत्रकार की अर्जी पर नोटिस जारी किया है।
- याचिकाकर्ता 11 हफ्ते की गर्भवती थी और दावा किया कि कोर्ट गेट के पास वह गिर गईं और उन्हें शारीरिक चोट आई।
- मांगी गई राहतों में CCTV फुटेज को सुरक्षित रखना, बिना शर्त माफी और पुलिस सुरक्षा शामिल है।
📋 केस एक नज़र में
| अदालत | सुप्रीम कोर्ट |
|---|---|
| बेंच | भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत |
| केस | Richa Parashar v. Rahul Gandhi & Ors. (राजनीतिक प्रदर्शनों से संबंधित लंबित याचिका में) |
| तारीख | 2026-10-27 |
| कानून / मुद्दा | भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74, 115(2), 125, 131 के साथ धारा 3(5) |
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक मीडियाकर्मी द्वारा दायर अर्जी पर औपचारिक रूप से नोटिस जारी किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कोर्ट परिसर के बाहर उनके साथ मारपीट की गई। यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने आया, जब 27 अक्टूबर, 2026 को तत्काल सुनवाई के लिए इसका उल्लेख किया गया।
यह हस्तक्षेप ड्यूटी पर मौजूद पत्रकारों की सुरक्षा और न्यायिक संस्थानों के पास राजनीतिक सभाओं को संभालने से संबंधित महत्वपूर्ण सवालों को छूता है। याचिकाकर्ता ने एक औपचारिक आपराधिक शिकायत दर्ज करने, महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित रखने और निरंतर उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए तत्काल निर्देश मांगने हेतु सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है।
पृष्ठभूमि
यह घटना कथित तौर पर 12 अक्टूबर को हुई, जब विपक्षी नेता राहुल गांधी अन्य नेताओं के साथ एक कानूनी याचिका दायर करने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। पत्रकार ऋचा पाराशर के रूप में पहचानी गई याचिकाकर्ता ने बताया कि वह सुप्रीम कोर्ट गेट के बाहर अपनी नियमित रिपोर्टिंग ड्यूटी कर रही थीं, और उस समय वह ग्यारह हफ्ते और तीन दिन की गर्भवती थीं।
उनकी कानूनी अर्जी के अनुसार, भीड़ के बीच उन्हें जोर से गेट की ओर धक्का दिया गया, जिससे उनका संतुलन बिगड़ गया और वे अपने हाथों के बल जोर से गिर गईं। उन्होंने बताया कि गिरने के दौरान उनका मोबाइल फोन टूट गया और उनका रिकॉर्डिंग माइक्रोफोन अलग हो गया। उन्होंने आगे बताया कि उन्होंने भीड़ से धक्का देना बंद करने की गुहार लगाई, लेकिन तेज राजनीतिक नारों के बीच उनकी आवाज अनसुनी रह गई।
घटना के बाद, पत्रकार को पेट में दर्द हुआ और उस शाम को सर गंगा राम अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उन्हें दवाएं, जांच की सलाह और जटिलताएं होने पर लौटने की चेतावनी के साथ छुट्टी दे दी। उनकी अर्जी में कहा गया है कि इसके बाद उन्हें गंभीर मानसिक तनाव, हाथों से खून बहने और सोशल मीडिया पर बदनामी का सामना करना पड़ा, जबकि स्थानीय पुलिस ने उप पुलिस आयुक्त (DCP) को औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के बावजूद प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने में विफल रही।
कोर्ट ने क्या कहा
वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने मौखिक उल्लेख के माध्यम से यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया। अर्जी में उठाए गए शुरुआती आधारों को सुनने के बाद, अदालत ने प्रतिवादियों को सुनने का फैसला करके हस्तक्षेप किया।
पीठ ने प्रतिपक्षी पक्षों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया ताकि अर्जी में लगाए गए आरोपों और मांगों पर उनकी औपचारिक प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सके। पीठ के समक्ष लाई गई अर्जी में शिकायत इस प्रकार दर्ज है:
“धक्का खुलेआम, भीड़भाड़ वाली जगह पर, सुरक्षा कर्मियों, पत्रकारों और अन्य लोगों की मौजूदगी में, उनके स्पष्ट अनुरोधों के बावजूद दिया गया...”
नोटिस जारी करने का अदालत का फैसला यह दर्शाता है कि प्रतिवादी, जिनमें नामित राजनीतिक नेता और अधिकारी शामिल हैं, को याचिका में उठाए गए सवालों पर पीठ के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करना होगा।
कानून आसान भाषा में
जब कोई व्यक्ति अदालत से आपराधिक शिकायत दर्ज करने का आदेश मांगने के लिए संपर्क करता है, तो वे आम तौर पर यह दावा कर रहे होते हैं कि अधिकारियों ने कथित अपराध की जांच करने के अपने वैधानिक कर्तव्य की उपेक्षा की है। भारतीय आपराधिक प्रक्रिया के तहत, जब गंभीर, पहचान योग्य अपराधों का विवरण देने वाली शिकायत पुलिस को सौंपी जाती है, तो कानून अपेक्षा करता है कि अधिकारी मामला दर्ज करके एक औपचारिक जांच शुरू करें।
इस विवाद में, शिकायतकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) के कई प्रावधानों का उल्लेख किया, जिनमें बल प्रयोग, चोट पहुंचाना, जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कार्य और सामान्य इरादे से किए गए कार्य शामिल हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य जानबूझकर शारीरिक नुकसान, मानव जीवन को खतरे में डालने वाले लापरवाह कार्य और व्यक्तियों के समूहों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए अपराधों को दंडित करना है।
इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने 'Impleadment' (किसी मौजूदा मुकदमे में शामिल होने का अनुरोध) की मांग की, जो एक कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत कोई गैर-पक्षकार अदालत द्वारा जांचे जा रहे व्यापक विषय से सीधे तौर पर संबंधित अपने हितों या अनुभवों के कारण मौजूदा मुकदमे में शामिल होने का अनुरोध करता है। यहां, याचिकाकर्ता ने अपनी व्यक्तिगत शिकायत को अदालत परिसरों के भीतर राजनीतिक विरोध के मुद्दे से संबंधित एक बड़ी लंबित याचिका से जोड़ा।
आम लोगों पर असर
यह मामला भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर काम करने वाले पेशेवरों, विशेषकर महिलाओं और कामकाजी माताओं द्वारा सामना की जाने वाली रोजमर्रा की सुरक्षा चुनौतियों को उजागर करता है। यह इस मौलिक अपेक्षा पर ध्यान आकर्षित करता है कि सार्वजनिक हस्तियों, उनके कर्मचारियों और सुरक्षा टीमों को सार्वजनिक स्थानों पर राहगीरों और मीडिया कर्मियों के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए।
आम नागरिकों के लिए, यह कार्यवाही कानून प्रवर्तन एजेंसियों को जवाबदेह ठहराने के महत्व को भी रेखांकित करती है, खासकर जब शिकायतें दर्ज की जाती हैं। जब कोई नागरिक चिकित्सा रिकॉर्ड और चोट के सबूतों के साथ पुलिस के पास जाता है, तो शामिल व्यक्तियों की प्रोफाइल या राजनीतिक स्थिति की परवाह किए बिना एक निष्पक्ष जांच की उम्मीद की जाती है।
इसके अलावा, यह मामला न्यायिक स्थानों की गरिमा पर केंद्रित है। इसके परिणाम से अदालत के प्रवेश द्वारों के पास बड़े पैमाने पर राजनीतिक सभाओं, रैलियों और प्रदर्शनों के संबंध में सख्त नियम बन सकते हैं, जिससे आम वादी, वकील और अदालत आगंतुकों के लिए सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित हो सके।
ऐसी स्थिति में क्या करें
यदि आप या आपका कोई परिचित किसी सार्वजनिक स्थान पर अप्रत्याशित शारीरिक चोट, हमले या उत्पीड़न का शिकार होता है, तो निम्नलिखित सामान्य कदम उठाएं:
- किसी स्थापित अस्पताल में तत्काल चिकित्सा सहायता लें और सुनिश्चित करें कि सभी चोटों, लक्षणों और डॉक्टरों के अवलोकनों को एक औपचारिक चिकित्सा रिपोर्ट में दर्ज किया जाए।
- टूटे हुए व्यक्तिगत सामान, चोटों की तस्वीरें, वीडियो फुटेज और गवाहों की संपर्क जानकारी जैसे सभी भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को तुरंत सुरक्षित रखें।
- निकटतम पुलिस स्टेशन या उच्च पर्यवेक्षी पुलिस अधिकारियों के साथ तुरंत एक औपचारिक, लिखित पुलिस शिकायत दर्ज करें, और एक पावती प्रति (acknowledged copy) दिनांकित मुहर के साथ अपने पास रखें।
- नियमित स्वचालित विलोपन अवधि बीतने से पहले, आसपास के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, जैसे सार्वजनिक CCTV फुटेज, को संरक्षित करने का अनुरोध करें।
- यदि अधिकारी शिकायत पर कार्रवाई करने में देरी करते हैं या इनकार करते हैं, तो अदालत में उपलब्ध उपचारों का पता लगाने के लिए तुरंत एक अनुभवी वकील से सलाह लें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सुप्रीम कोर्ट में पत्रकार द्वारा मांगी गई मुख्य राहत क्या है?
याचिकाकर्ता ने अदालत से तत्काल FIR दर्ज करने का आदेश देने, पुलिस से स्थिति रिपोर्ट मांगने, CCTV और वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित करने, व्यक्तिगत सुरक्षा उपाय प्रदान करने और मुआवजे के साथ माफी मांगने की मांग की है।
शिकायतकर्ता ने किस कानूनी संहिता के तहत FIR दर्ज करने की मांग की थी?
पुलिस को सौंपी गई शिकायत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के कई प्रावधानों के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी, जिसमें चोट पहुंचाने और दूसरों की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कार्य शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
वरिष्ठ वकील द्वारा मौखिक उल्लेख के बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया ताकि आरोपों पर उनकी आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सके।
यह अर्जी किस तरह के मामले में दायर की गई थी?
यह अर्जी चार वकीलों द्वारा शुरू की गई एक मौजूदा याचिका में हस्तक्षेप के तौर पर दायर की गई थी, जो अदालत परिसर के अंदर राजनीतिक प्रदर्शनों के मुद्दे से संबंधित थी।