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⚖️ सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया 📅 16 अक्टूबर 2026 ⏱ 5 मिनट में पढ़ें

केरल में बिना अधिकतम सीमा वाले कोर्ट फीस की सुप्रीम कोर्ट करेगा समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने केरल में कोर्ट फीस में भारी बढ़ोतरी और बिना अधिकतम सीमा वाले एड वैलोरम शुल्क के खिलाफ दायर याचिका पर नोटिस जारी किया है।

⚡ त्वरित सारांश

सुप्रीम कोर्ट केरल के संशोधित नियमों के तहत बिना किसी अधिकतम सीमा के मूल्य-आधारित कोर्ट फीस (Ad Valorem Court Fees) लगाए जाने की वैधता की जांच करने पर सहमत हो गया है। केरल हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन की इस याचिका में कोर्ट फीस में 9,900 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने नोटिस जारी कर मामले को इस बिंदु तक सीमित रखा है कि क्या बिना किसी ऊपरी सीमा के ऐसी फीस वसूलना कानूनी रूप से सही है।

📌 मुख्य बातें

  1. सुप्रीम कोर्ट जांच करेगा कि बिना किसी अधिकतम सीमा के मूल्य-आधारित कोर्ट फीस लगाना कानूनी रूप से वैध है या नहीं।
  2. केरल हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन ने विभिन्न मामलों में फीस में 9,900% तक की भारी बढ़ोतरी को चुनौती दी।
  3. मुआवजे के दावों और अग्रिम जमानत के मामलों में आम नागरिकों के न्याय पाने के अधिकार पर चिंता जताई गई।

📋 केस एक नज़र में

अदालतभारत का सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India)
बेंचभारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची
केसKerala High Court Advocates' Association v. State of Kerala
तारीख2026-10-16
कानून / मुद्दाकेरल कोर्ट फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट 1959; केरल फाइनेंस एक्ट 2025; कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट; संविधान के अनुच्छेद 14 और 21

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बिना कोई अधिकतम सीमा (Upper Cap) तय किए मूल्य-आधारित कोर्ट फीस (Ad Valorem Court Fees) वसूलने की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करने पर सहमति जताई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने केरल राज्य में लागू की गई अदालती फीस की भारी बढ़ोतरी को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है।

यह मामला शीर्ष अदालत में तब पहुंचा जब महत्वपूर्ण संशोधनों के जरिए मुकदमेबाजी के खर्च को कई गुना बढ़ा दिया गया, जिससे विभिन्न राहतों के लिए अदालत जाने वाले नागरिकों पर सीधा असर पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मौजूदा जांच को विशेष रूप से इसी सवाल तक सीमित रखा है कि क्या दावे की राशि के तय प्रतिशत के रूप में तय की जाने वाली कोर्ट फीस बिना किसी ऊपरी सीमा के लागू रह सकती है।

पृष्ठभूमि

यह विवाद केरल फाइनेंस एक्ट, 2025 के जरिए लाए गए संशोधनों से उपजा है, जिसने केरल कोर्ट फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट, 1959 में बदलाव किए थे। इन संशोधनों के बाद, केरल हाई कोर्ट ने 31 अक्टूबर, 2025 को दिए अपने फैसले में इस संशोधित फीस ढांचे को बरकरार रखा था।

उस फैसले से असंतुष्ट होकर, केरल हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन ने विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) के जरिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वकीलों के संगठन की दलील थी कि इन संशोधनों के कारण विभिन्न प्रकार की अदालती अर्जियों में फीस में लगभग 400 प्रतिशत से लेकर करीब 9,900 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी हुई है।

उदाहरण के लिए, एक रिट याचिका (Writ Petition) दायर करने की फीस 100 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये कर दी गई, जबकि रिट अपील की फीस 200 रुपये से बढ़कर 1,000 रुपये हो गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) अर्जियों पर देय शुल्क 10 रुपये से सीधे 500 रुपये कर दिया गया, जो कि 4,900 प्रतिशत का उछाल है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है।

कोर्ट ने क्या कहा

सुनवाई के दौरान वकीलों की संस्था की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने दलील दी कि बिना किसी सीमा के मूल्य-आधारित फीस वसूलना इसे कानूनी फीस के बजाय एक सामान्य कर (Tax) जैसा बना देता है। उन्होंने कहा कि अदालती शुल्कों का न्याय प्रशासन के वास्तविक खर्च से तार्किक संबंध होना चाहिए और उन्होंने ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों में भी ऐसी फीस की एक अधिकतम सीमा तय है।

जस्टिस जोयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि व्यावसायिक विवादों (Commercial Disputes) में अदालत का काफी समय और संसाधन लगते हैं, और इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि वाणिज्यिक मुकदमों में लगने वाले न्यायिक समय:

"की एक कीमत होनी चाहिए।"

जस्टिस बागची ने व्यावसायिक विवादों को सामान्य मुकदमों से अलग बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कोर्ट फीस विवाद के मूल्य और जजों द्वारा उसे सुलझाने में लगाए गए समय के अनुपात में होनी चाहिए। वहीं, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने अन्य भारतीय राज्यों की दरों से तुलना करने वाले चार्ट पेश नहीं किए हैं, और उन्होंने अदालत के प्रशासनिक खर्चों और कोर्ट फीस से होने वाली आय के बीच के वित्तीय अंतर के बारे में भी पूछा।

जब वकील ने राज्य सरकार को कोर्ट फीस से पूरी छूट दिए जाने पर सवाल उठाया, तो मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि ऐसी व्यवस्था में दाहिना हाथ केवल बाएं हाथ को भुगतान कर रहा होता है। अंततः, पीठ ने अपने नोटिस को बिना अधिकतम सीमा वाले एड वैलोरम कोर्ट शुल्कों की वैधता की समीक्षा तक ही सीमित रखा।

कानून आसान भाषा में

जब नागरिक दीवानी अदालतों (Civil Courts) का दरवाजा खटखटाते हैं, तो कानूनन उन्हें अदालती शुल्क यानी कोर्ट फीस देनी होती है। यह फीस आमतौर पर दो तरह की होती है: विशिष्ट आवेदनों के लिए तय शुल्क (Fixed Fees) और विवाद की मौद्रिक राशि के आधार पर प्रतिशत के रूप में तय शुल्क, जिसे कानूनी भाषा में मूल्य-आधारित शुल्क (Ad Valorem Fees) कहा जाता है।

मानक कानूनी प्रक्रिया में, फीस किसी विशिष्ट सार्वजनिक सेवा या प्रशासनिक लागत के बदले लिया जाने वाला शुल्क मानी जाती है, जबकि टैक्स (Tax) बिना किसी सीधी सेवा के सरकारी राजस्व जुटाने का साधन होता है। यदि किसी दावे के मूल्य के आधार पर कोर्ट फीस बिना किसी ऊपरी सीमा के लगातार बढ़ती रहे, तो आलोचकों का तर्क है कि यह न्याय पर लगाया गया एक अनुचित टैक्स बन जाता है।

कानून यह भी कहता है कि न्याय तक पहुंचना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, जिसमें अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) शामिल हैं। अदालती खर्च अत्यधिक बढ़ा देने से आम नागरिक अपने बुनियादी कानूनी अधिकारों की रक्षा करने से वंचित हो सकते हैं।

आम लोगों पर असर

इस कानूनी लड़ाई का केरल के आम मुकदमों पर सीधा असर पड़ता है। जब अदालती फीस बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो आम आदमी के लिए अदालत से न्याय मांगना बेहद महंगा हो जाता है, खासकर तब जब सरकारी फैसलों को चुनौती देनी हो या जमानत अर्जियों के जरिए अपनी निजी आजादी की रक्षा करनी हो।

इस नीति का सबसे बुरा असर उन लोगों पर पड़ता है जो मुआवजे के दावे कर रहे हैं, जैसे मृतक पीड़ितों के परिवार या सड़क दुर्घटना में घायल लोग। जब इन मुआवजा मामलों में बिना किसी सीमा के प्रतिशत-आधारित फीस मांगी जाती है, तो पहले से ही आर्थिक तंगी झेल रहे पीड़ित परिवारों को सिर्फ अपनी बात अदालत के सामने रखने के लिए शुरुआत में ही भारी रकम जुटानी पड़ती है।

इसके अलावा, छोटे व्यापारियों और कारोबारियों के लिए अत्यधिक खर्चों के चलते वाणिज्यिक अदालतों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह जांचना कि क्या कोर्ट फीस पर अधिकतम सीमा अनिवार्य होनी चाहिए, यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि अदालती खर्च वाजिब रहे और नागरिकों के लिए न्याय का रास्ता बंद न हो।

ऐसी स्थिति में क्या करें

  • कोई भी कानूनी कदम उठाने से पहले अपने सभी दावों के दस्तावेज, वित्तीय हिसाब-किताब और मूल्यांकन से जुड़े कागजात पूरी तरह व्यवस्थित रखें।
  • अदालत में केस दायर करने से पहले अपने वकील के साथ लागू कोर्ट फीस नियमों और दरों की अच्छी तरह समीक्षा करें।
  • कानून द्वारा तय समय सीमा (Limitation Period) के भीतर कदम उठाएं ताकि कानूनी देरी की वजह से आपका अदालती खर्च और न बढ़े।
  • किसी अनुभवी वकील से सलाह लें और जानें कि क्या आपके मामले की श्रेणी में फीस से छूट, फीस में रियायत या कोई अन्य वैधानिक राहत मिल सकती है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

एड वैलोरम (Ad Valorem) कोर्ट फीस क्या होती है?

यह वह अदालती शुल्क है जो किसी निश्चित रकम के बजाय विवादित संपत्ति या दावे की कुल कीमत के तय प्रतिशत के आधार पर लिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में केरल के कोर्ट फीस नियम को क्यों चुनौती दी गई है?

याचिका में आरोप लगाया गया है कि केरल सरकार ने कोर्ट फीस में 400% से लेकर 9,900% तक की भारी बढ़ोतरी की है और फीस की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं की है, जिससे न्याय पाना बहुत महंगा हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में किस मुख्य बिंदु पर नोटिस जारी किया है?

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से यह जांचने के लिए नोटिस जारी किया है कि क्या बिना किसी अधिकतम सीमा (Upper Cap) के प्रतिशत-आधारित कोर्ट फीस वसूलना कानूनी और संवैधानिक रूप से सही है।

📖 कानूनी शब्दों के मतलब

Ad Valorem Court Fee (मूल्य-आधारित कोर्ट फीस)मुकदमे में शामिल संपत्ति या दावे के कुल मूल्य के अनुपात या प्रतिशत के आधार पर तय की जाने वाली अदालती फीस।
Special Leave Petition (विशेष अनुमति याचिका)संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत किसी भी अदालत या न्यायाधिकरण के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की विशेष अर्जी।
Anticipatory Bail (अग्रिम जमानत)संभावित गिरफ्तारी की आशंका होने पर अदालत द्वारा गिरफ्तारी से पहले दी जाने वाली अग्रिम सुरक्षा या जमानत।
Writ Petition (रिट याचिका)मौलिक अधिकारों की रक्षा या कानूनी उल्लंघन के खिलाफ हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में दायर की जाने वाली औपचारिक अर्जी।
⚠️ यह लेख एक सरल सारांश है, केवल सामान्य जानकारी के लिए। इसे कानूनी सलाह न समझें — अपने मामले के लिए वकील से सलाह लें।
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