⚡ त्वरित सारांश
सुप्रीम कोर्ट ने फोन और वीडियो कॉल के जरिए हो रहे डिजिटल अरेस्ट के मामलों में पढ़े-लिखे लोगों के फंसने पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने संकेत दिया है कि अगर बैंक बिना उचित जांच-पड़ताल के संदिग्ध लेनदेन को पास करते हैं, तो उन्हें पीड़ितों को मुआवजा देना पड़ सकता है और उन पर कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
📌 मुख्य बातें
- सीजेआई सूर्यकांत ने साफ किया कि कानूनन फोन या मोबाइल के जरिए किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
- सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि बैंकों की लापरवाही से ठगी होने पर उन्हें पीड़ितों को मुआवजा देना चाहिए।
- कोर्ट ने सवाल उठाया कि असामान्य लेनदेन दिखने पर बैंक तुरंत उसे रोकते क्यों नहीं और पुलिस को सूचना क्यों नहीं देते।
📋 केस एक नज़र में
| अदालत | सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) |
|---|---|
| बेंच | सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस वी. मोहना |
| केस | In Re: Digital Arrest Scam (Suo Motu) |
| तारीख | 2026-10-29 |
| कानून / मुद्दा | डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड, बैंकिंग सतर्कता (Banking Due Diligence), साइबर अपराध रोकथाम |
सुप्रीम कोर्ट ने 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर हो रही ऑनलाइन वसूली और ठगी के बढ़ते मामलों पर बेहद हैरानी और गहरी नाराजगी जताई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने इस बात पर चिंता जताई कि आखिर पढ़े-लिखे लोग भी कैसे फोन और वीडियो कॉल करने वाले ठगों के झांसे में आकर अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी गंवा रहे हैं।
29 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दो टूक कहा कि कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके तहत पुलिस या अदालत किसी नागरिक को स्मार्टफोन के जरिए हिरासत में ले सके। शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी कि खाताधारकों के ठगे जाने के बाद सफाई देने के बजाय बैंकों को पहले से सक्रिय जिम्मेदारी निभानी होगी।
पृष्ठभूमि
यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद संज्ञान लेते हुए शुरू की गई एक स्वतः संज्ञान (Suo Motu) याचिका से जुड़ा है। इसमें ऐसे साइबर ठगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है जो फर्जी पुलिस अधिकारी, केंद्रीय जांच एजेंसियों के अफसर या कोर्ट के कर्मचारी बनकर लोगों को डराते हैं। ये ठग पीड़ितों पर अवैध गतिविधियों में शामिल होने का झूठा आरोप लगाते हैं और फिर जमानत (Bail), कानूनी मंजूरी या संपत्ति की जांच के नाम पर उनसे मोटी रकम ट्रांसफर करवा लेते हैं।
मामले में अदालत की सहायता कर रहीं न्याय मित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ वकील एनएस नप्पिनई ने बताया कि सरकारी चेतावनियों और 30 मार्च को सरकार द्वारा दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के बावजूद ये गिरोह बेधड़क काम कर रहे हैं। उन्होंने हाल ही की एक घटना का हवाला दिया जहां एक महिला को तुरंत जेल भेजने की झूठी धमकी देकर 2.5 करोड़ रुपये ठग लिए गए।
न्याय मित्र ने कोर्ट को बताया कि पीड़ित अत्यधिक डर और घबराहट की वजह से इन ठगों के जाल में फंस जाते हैं, जिसे कुछ डॉक्टर सम्मोहन (Hypnosis) जैसी स्थिति बताते हैं। मीडिया में लगातार खबरें आने के बावजूद कई राज्यों में लोग इन धमकियों के आगे झुक रहे हैं।
कोर्ट ने क्या कहा
बेंच ने टिप्पणी की कि किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में रहने वाले नागरिकों को यह बुनियादी बात समझनी चाहिए कि पुलिस या अदालतें वीडियो कॉल या स्क्रीन के जरिए गिरफ्तारी (Arrest) नहीं करतीं। मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर हैरानी जताई कि कोई मोबाइल पर गिरफ्तार होने का यकीन कैसे कर सकता है।
"अगर आप यह सोचते हैं कि मोबाइल पर आपकी गिरफ्तारी हो रही है, तो आप एक लोकतांत्रिक देश में किस तरह के नागरिक हैं?"
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर ठग यह दावा करते हैं कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अदालती आदेश जारी हुआ है, तो इसकी सच्चाई अदालतों की आधिकारिक वेबसाइटों पर जाकर आसानी से जांची जा सकती है। बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि पढ़े-लिखे पेशेवर भी ऐसे फर्जी कॉल से डरकर पैसे दे रहे हैं।
बैंकिंग व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंक रियल-टाइम में ऐसे संदिग्ध लेनदेन को रोकने में नाकाम क्यों हो रहे हैं। कोर्ट ने पूछा कि जिस बैंक के पास अपने ग्राहक के पूरे वित्तीय लेनदेन का इतिहास होता है, वह अचानक होने वाले किसी असामान्य और भारी-भरकम ट्रांसफर को देखकर तुरंत अलर्ट क्यों नहीं होता?
बेंच ने कहा कि घटना के बाद केवल रिपोर्ट दर्ज कराना काफी नहीं है, बैंकों को पहले से सुरक्षा उपाय करने होंगे। मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया कि कोर्ट बैंकों को पीड़ितों का नुकसान भरने और सतर्कता न बरतने पर आपराधिक मुकदमे (Criminal Prosecution) का सामना करने के लिए बाध्यकारी निर्देश जारी करने पर विचार कर रहा है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि साइबर खतरों से निपटने के लिए भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) चौबीसों घंटे काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक (RBI) ने नियमों को और सख्त करने के लिए बातचीत शुरू की है और बैंकों का अलर्ट सिस्टम छह महीने पहले की तुलना में बेहतर हुआ है, हालांकि उन्होंने न्याय मित्र के कुछ सुझावों पर सावधानी बरतने की बात कही।
कानून आसान भाषा में
भारतीय आपराधिक कानून के तहत, गिरफ्तारी का मतलब होता है किसी अधिकृत अधिकारी द्वारा कानून के तहत किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से हिरासत (Custody) में लेना। कोई भी जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल, सोशल मीडिया ऐप या फोन पर कैद या अरेस्ट नहीं कर सकती।
इसके अलावा, असली कानून प्रवर्तन एजेंसियां या अदालतें किसी व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने, मुचलका भरने या जेल जाने से बचने के लिए कभी भी किसी निजी बैंक खाते में पैसे भेजने को नहीं कहतीं। कोई भी वैध समन (Summons), वारंट (Warrants) या अदालती आदेश हमेशा आधिकारिक माध्यमों और रजिस्टर्ड रिकॉर्ड के जरिए ही दिए जाते हैं।
बैंकों की भी अपने ग्राहकों के प्रति जिम्मेदारी बनती है। अगर किसी खाते में अचानक असामान्य गतिविधि देखी जाती है, तो कानूनी नियमों के तहत बैंक का यह कर्तव्य है कि वह उस संदिग्ध लेनदेन को तुरंत रोके, ग्राहक से संपर्क करे और पैसा ट्रांसफर होने से पहले स्थानीय पुलिस को सूचित करे।
आम लोगों पर असर
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख से साइबर ठगों द्वारा मानसिक दबाव बनाकर की जाने वाली ठगी पर कड़ा प्रहार होगा। इससे आम नागरिकों को भरोसा मिलेगा कि अज्ञात नंबरों से आने वाली तथाकथित डिजिटल अरेस्ट की धमकियां पूरी तरह फर्जी और बेबुनियाद होती हैं।
अगर बैंकों पर ठगी का शिकार हुए ग्राहकों को मुआवजा देने की कानूनी जिम्मेदारी तय होती है, तो बैंक ज्यादा सतर्क होंगे और असामान्य व बड़े लेनदेन पर तुरंत रोक लगाएंगे, जिससे आम जनता का पैसा सुरक्षित रहेगा।
साथ ही, बुजुर्गों और ऐसे कमजोर वर्ग के लोगों को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी, जिन्हें यह गिरोह डरा-धमकाकर सबसे ज्यादा अपना शिकार बनाते हैं।
ऐसी स्थिति में क्या करें
- अगर कोई अनजान कॉलर आपको 'डिजिटल अरेस्ट', अरेस्ट वारंट या ऑनलाइन कानूनी कार्रवाई की धमकी दे, तो तुरंत फोन काट दें।
- हमेशा याद रखें कि कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर पूछताछ करके पैसे, जमानत राशि या फीस की मांग नहीं करती।
- अगर कोई अदालती आदेश या समन का दावा करे, तो संबंधित कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर उसकी पुष्टि करें।
- अगर आपके साथ ऐसी कोई घटना हो, तो तुरंत अपने बैंक को सूचित करें ताकि पैसे का ट्रांसफर तुरंत रोका जा सके।
- स्थानीय पुलिस थाने और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर तुरंत आधिकारिक साइबर शिकायत दर्ज कराएं।
- ठगों से जुड़ी सभी जानकारी जैसे फोन नंबर, कॉल रिकॉर्डिंग, मैसेज और लेनदेन की रसीदें सुरक्षित रखें।
- कानूनी प्रक्रियाओं को सही से समझने और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी योग्य वकील (Lawyer) से कानूनी सलाह लें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई प्रावधान है?
नहीं, भारतीय कानून में फोन या वीडियो कॉल के जरिए किसी को गिरफ्तार करने या डिजिटल अरेस्ट में रखने का कोई प्रावधान नहीं है।
यदि कोई फर्जी पुलिस अधिकारी बनकर पैसे मांगे तो क्या करना चाहिए?
तुरंत कॉल काट दें, किसी भी खाते में पैसे न भेजें और तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन (1930) या नजदीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराएं।