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⚖️ सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया 📅 28 अक्टूबर 2026 ⏱ 5 मिनट में पढ़ें

दिल्ली में दिवाली बाद प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: जज घर से काम नहीं कर सकते

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में दिवाली के बाद बढ़ते वायु प्रदूषण पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि वकीलों के पास वर्चुअल पेशी का विकल्प है, पर जजों को कोर्ट आना पड़ता है।

⚡ त्वरित सारांश

एक मामले की सुनवाई की तारीख तय करते समय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि दिल्ली में दिवाली के बाद प्रदूषण काफी बढ़ जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि वकीलों के पास तो ऑनलाइन पेश होने की सुविधा है, लेकिन जजों को अदालत में खुद मौजूद रहना पड़ता है।

📌 मुख्य बातें

  1. जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि दिवाली के त्योहार के बाद दिल्ली की हवा काफी खराब हो जाती है।
  2. वकीलों के पास ऑनलाइन सुनवाई का विकल्प है, लेकिन जजों को शारीरिक रूप से कोर्ट में मौजूद रहना पड़ता है।
  3. सुप्रीम कोर्ट दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के विभिन्न कारणों से निपटने के उपायों की लगातार निगरानी कर रहा है।

📋 केस एक नज़र में

अदालतसुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India)
बेंचजस्टिस विक्रम नाथ (जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के पुराने आदेशों का भी संदर्भ)
केसMC Mehta v. Union of India (referenced)
तारीख2026-10-28
कानून / मुद्दाग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP), पटाखों पर प्रतिबंध से जुड़े नियम

सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों के मौसम में देश की राजधानी दिल्ली में बिगड़ती हवा की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता जताई है। 28 अक्टूबर 2026 को एक सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि दिवाली के जश्न के बाद दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।

यह मौखिक टिप्पणी उस समय आई जब पीठ और वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के बीच मामले की अगली तारीख तय करने को लेकर बातचीत हो रही थी। इस बातचीत से यह बात सामने आई कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में खतरनाक प्रदूषण के बावजूद अधिकारियों और आम लोगों को रोज दफ्तर जाकर काम करना पड़ता है।

पृष्ठभूमि

यह मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट एक लंबित केस की सुनवाई के लिए अगली तारीख तय कर रहा था। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने गुजारिश की कि इस मामले को दिवाली की छुट्टियों के बाद 17 नवंबर को सुना जाए, क्योंकि दिवाली के आसपास दिल्ली में बहुत प्रदूषण रहता है। हालांकि, दूसरी पार्टी के वकील ने नवंबर के पहले हफ्ते में सुनवाई की मांग की।

जस्टिस विक्रम नाथ ने सुझाव दिया कि मामले की सुनवाई छुट्टियों के बाद करने की बजाय पहले ही कर ली जाए। जज ने कहा कि त्योहार से पहले की हवा बाद की तुलना में थोड़ी बेहतर होगी, क्योंकि जश्न खत्म होने के बाद राजधानी में जहरीली धुंध की मोटी चादर जम जाती है। वकीलों ने कहा कि प्रदूषण तो त्योहार से पहले और बाद दोनों समय रहता है, जिसके बाद जजों के सामने आने वाली दिक्कतों पर चर्चा होने लगी।

आंकड़े भी इस मौसमी गिरावट की पुष्टि करते हैं। पिछले साल, दिल्ली का 24 घंटे का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index - AQI) 18 अक्टूबर 2025 को 268 था, जो दिवाली के दिन बढ़कर 345 हो गया और 22 अक्टूबर को 353 तक पहुंचकर 'बेहद खराब' श्रेणी में दर्ज हुआ। वहीं अक्टूबर 2026 के अंत में जब एक्यूआई 'खराब' श्रेणी में पहुंचा, तो वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने ग्रैप (GRAP) का पहला चरण लागू किया।

कोर्ट ने क्या कहा

प्रदूषण के दौर में भी कोर्ट का काम जारी रखने की मजबूरी बताते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि जजों के पास अदालत से दूर रहने का विकल्प नहीं होता। उन्होंने वकीलों और जजों के काम की स्थिति का अंतर समझाया। वकीलों के पास वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ऑनलाइन पेश होने की सुविधा होती है, जबकि जजों को कोर्ट रूम में खुद बैठना पड़ता है।

"हम घर पर नहीं बैठ सकते। आपके पास घर बैठकर खुद को प्रदूषण से बचाने का विशेषाधिकार है, लेकिन हमारे पास नहीं।"

इस बातचीत में दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण पर कोर्ट की निगरानी का जिक्र भी आया। इससे पहले, एमसी मेहता बनाम भारत संघ (MC Mehta v. Union of India) मामले में जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा और उत्तर प्रदेश के पड़ोसी जिलों में पटाखों पर लगी रोक और प्रदूषण विरोधी नियमों के पालन की सख्त समीक्षा की थी।

उन आदेशों में कहा गया था कि अधिकारी नियमों को सख्ती से लागू करें। कोर्ट ने पहले भी टिप्पणी की थी कि कोई भी धार्मिक परंपरा ऐसी गतिविधियों की इजाजत नहीं देती जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान हो या आम लोगों की सेहत खतरे में पड़े। इसी आधार पर पटाखों के निर्माण, भंडारण, बिक्री और फोड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध को बरकरार रखा गया था।

कानून आसान भाषा में

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा की निगरानी और प्रदूषण रोकने के लिए एक तय नियम बनाया गया है। इसमें सबसे अहम है ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (Graded Response Action Plan - GRAP)। यह एक ऐसा प्रशासनिक ढांचा है जो वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के स्तर के आधार पर प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर अपने आप चरणबद्ध रोक लगा देता है।

जब हवा 'खराब' या 'बेहद खराब' स्तर पर पहुंचती है, तो वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) जैसी संस्थाएं कड़े प्रतिबंध जारी करती हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के तहत स्वच्छ हवा और बेहतर स्वास्थ्य को नागरिकों का मूल अधिकार माना है। इसी के तहत फैक्ट्रियों के धुएं, खुले में कचरा जलाने और अवैध पटाखों पर लगातार दिशा-निर्देश दिए जाते हैं।

कोर्ट ने ग्रीन पटाखों जैसी छूट को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पहले यह स्पष्ट किया है कि जब तक इस बात के पुख्ता वैज्ञानिक सबूत न हों कि इन पटाखों से होने वाला धुआं बिल्कुल न के बराबर है, तब तक इन्हें जलाने की छूट नहीं दी जा सकती।

आम लोगों पर असर

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ होता है कि दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण यहां रहने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित करता है। कुछ कामकाजी लोगों के पास घर से काम (Work from Home) या ऑनलाइन जुड़ने की सुविधा हो सकती है, लेकिन आम मजदूरों, कोर्ट के कर्मचारियों और अन्य सरकारी सेवकों को इस जहरीली हवा के बीच भी रोजाना काम पर निकलना ही पड़ता है।

यह संकट सीधे तौर पर आम जनता से जुड़ा है, क्योंकि प्रदूषण बढ़ने से सांस की गंभीर बीमारियां होती हैं, जिसका सबसे बुरा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है। साथ ही, कोर्ट की सख्ती के कारण आम जनजीवन पर कई नियम लागू होते हैं, जैसे पटाखों की बिक्री पर रोक, निर्माण कार्यों (Construction) पर पाबंदी और वाहनों के इस्तेमाल पर कड़े नियम।

दिल्ली के अलावा हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के एनसीआर जिलों में रहने वाले लोगों और व्यापारियों को भी फैक्ट्रियों के धुएं, पराली जलाने और कचरा जलाने से जुड़े कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है।

ऐसी स्थिति में क्या करें

प्रदूषण के दिनों में कानूनी नियमों का पालन करने और सेहत सुरक्षित रखने के लिए नागरिकों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  • वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के दैनिक दिशा-निर्देशों पर नजर रखें, ताकि पता चल सके कि ग्रैप (GRAP) का कौन सा चरण लागू है।
  • पटाखों की बिक्री, भंडारण या उन्हें जलाने पर लगी रोक का पूरी तरह पालन करें, ताकि कानूनी कार्रवाई और जुर्माने से बचा जा सके।
  • अपने निजी और व्यावसायिक वाहनों का प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) अपडेट रखें और समय पर सर्विस करवाएं।
  • फैक्ट्रियों से अवैध धुआं निकलने, खुले में कचरा जलाने या निर्माण स्थल पर उड़ने वाली धूल की शिकायत स्थानीय नगर निगम या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से करें।
  • यदि प्रदूषण नियमों के तहत कोई चालान या कार्रवाई होती है, तो किसी योग्य वकील (Lawyer) से उचित कानूनी सलाह लें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने एक सामान्य मामले की तारीख तय करते समय दिल्ली के प्रदूषण पर चर्चा क्यों की?

यह चर्चा तब शुरू हुई जब कोर्ट में केस की तारीख दिवाली से पहले या बाद में रखने पर बात हो रही थी। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि दिवाली के बाद प्रदूषण काफी बढ़ जाता है और जजों को इस जहरीली हवा में भी कोर्ट में खुद मौजूद रहना पड़ता है।

क्या भारी प्रदूषण के दौरान वकील सुप्रीम कोर्ट में ऑनलाइन पेश हो सकते हैं?

हां, वकीलों के पास वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का विकल्प होता है। अदालत ने इसी बात को रेखांकित करते हुए कहा कि वकील घर से काम कर सकते हैं, लेकिन जजों को अदालत में उपस्थित होना पड़ता है।

ग्रैप (GRAP) क्या है जिसका अक्सर जिक्र होता है?

ग्रैप यानी 'ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान' दिल्ली-एनसीआर में लागू होने वाले आपातकालीन नियमों की एक व्यवस्था है। जैसे-जैसे वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खराब होता है, वैसे-वैसे प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर पाबंदियां बढ़ा दी जाती हैं।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर ग्रीन पटाखों की अनुमति दी है?

एमसी मेहता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब तक ठोस वैज्ञानिक प्रमाण न हों कि इनसे प्रदूषण न के बराबर होगा, तब तक ग्रीन पटाखों को भी सामान्य छूट नहीं दी जा सकती।

📖 कानूनी शब्दों के मतलब

Air Quality Index / AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक)हवा में प्रदूषण के स्तर और उससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले खतरों को मापने का एक आधिकारिक पैमाना।
Graded Response Action Plan / GRAP (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान)दिल्ली-एनसीआर में हवा खराब होने पर चरणबद्ध तरीके से प्रदूषण पर रोक लगाने की एक आपातकालीन योजना।
Commission for Air Quality Management / CAQM (वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग)दिल्ली और आसपास के एनसीआर क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की रोकथाम और नियमों को लागू करने वाली वैधानिक संस्था।
Virtual Hearing (आभासी / ऑनलाइन सुनवाई)वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तकनीक के माध्यम से अदालत की कार्यवाही में शामिल होना, जिसमें कोर्ट रूम में व्यक्तिगत उपस्थिति की जरूरत नहीं होती।
⚠️ यह लेख एक सरल सारांश है, केवल सामान्य जानकारी के लिए। इसे कानूनी सलाह न समझें — अपने मामले के लिए वकील से सलाह लें।
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