⚡ त्वरित सारांश
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने उच्च न्यायपालिका और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के पद पर महिलाओं के बेहद कम प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया है। एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए उन्होंने कॉलेजियम की बैठकों में महिला जज को आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल करने का सुझाव दिया, ताकि फैसले अधिक समावेशी हो सकें।
📌 मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट में कुल 35 जजों की कार्यशील संख्या में से वर्तमान में केवल 3 महिला जज हैं।
- जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कॉलेजियम की कार्यवाही में महिला जज को आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल करने का सुझाव दिया।
- शुरुआती स्तर की न्यायिक सेवा से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते-पहुंचते महिलाओं का प्रतिनिधित्व तेजी से घट जाता है।
📋 केस एक नज़र में
| अदालत | सुप्रीम कोर्ट |
|---|---|
| बेंच | जस्टिस उज्ज्वल भुइयां |
| तारीख | 2026-10-31 |
| कानून / मुद्दा | न्यायिक नियुक्तियां और वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate) पदनाम |
सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने देश की उच्च न्यायपालिका (Higher Judiciary) में महिलाओं की बेहद कम भागीदारी को लेकर गंभीर चिंता जताई है। एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत में जजों की नियुक्ति करने वाली संस्था आज भी मुख्य रूप से पुरुषों के वर्चस्व वाली बनी हुई है।
जस्टिस भुइयां ने सुझाव दिया कि न्यायिक नियुक्तियों से जुड़ी इस समिति को अपनी चर्चाओं में किसी महिला जज को भी शामिल करने के लिए आमंत्रित करना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि इस कदम से चयन प्रक्रिया अधिक संतुलित, विविधतापूर्ण और देश के कानूनी परिदृश्य का सही प्रतिनिधित्व करने वाली बनेगी।
पृष्ठभूमि
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने ये विचार मेघालय स्थित 'यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी' के 12वें दीक्षांत समारोह के दौरान साझा किए। उन्होंने इस सच्चाई की ओर ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में कार्यरत 35 जजों में से केवल 3 ही महिलाएं हैं।
उन्होंने कहा कि यह कम संख्या देश भर में वकालत कर रहीं अनगिनत महिला वकीलों और न्यायिक अधिकारियों की मौजूदगी को सही ढंग से नहीं दर्शाती। जस्टिस भुइयां ने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट परिसर में महिला वकीलों द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में भी उन्होंने यही चिंता जाहिर की थी।
उस आयोजन में कानूनी विशेषज्ञों ने विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की कम संख्या तथा वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate) के रूप में उनके सीमित पदनामों पर चर्चा की थी। जस्टिस भुइयां ने जोर देकर कहा कि इस संस्थागत असंतुलन को ठीक करने के लिए ठोस सुधारों की सख्त जरूरत है।
कोर्ट ने क्या कहा
समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि महिला वकीलों द्वारा बेहतरीन प्रदर्शन किए जाने के बावजूद बहुत कम महिलाएं शीर्ष पदों तक पहुंच पाती हैं। उन्होंने इशारा किया कि व्यक्तिपरक चयन प्रक्रिया (Subjective Selection) के कारण अक्सर महिलाओं को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा पाने और उच्च न्यायपालिका में पदोन्नति हासिल करने से वंचित रहना पड़ता है।
जस्टिस भुइयां ने इसकी तुलना प्रतियोगी परीक्षाओं से की, जहां चयन पूरी तरह निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ मानदंडों (Objective Criteria) पर आधारित होता है। असम, मेघालय, राजस्थान, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में ग्रेड III स्तर की शुरुआती न्यायिक परीक्षाओं में महिलाएं 50 प्रतिशत से अधिक सीटें हासिल करती हैं, और असम में तो यह आंकड़ा 65 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
हालांकि, जैसे-जैसे न्यायिक करियर आगे बढ़ता है और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Chief Judicial Magistrate) जैसे ग्रेड II पदों तक पहुंचता है, महिलाओं की संख्या घटकर लगभग 45 प्रतिशत रह जाती है, और ग्रेड I पदों पर यह गिरकर 25 से 30 प्रतिशत हो जाती है। सबसे भारी गिरावट हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर देखने को मिलती है, जहां चयन लिखित परीक्षा के बजाय मुख्य रूप से कॉलेजियम (Collegium) की सिफारिशों पर निर्भर करता है।
“हमारे पास जो कॉलेजियम हैं, उनमें पुरुषों का ही दबदबा है; इसलिए कॉलेजियम की कार्यवाही में एक महिला जज को आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।”
जस्टिस भुइयां ने कहा कि इन अहम बैठकों में किसी महिला जज को शामिल करने से महत्वपूर्ण दृष्टिकोण मिलेगा और यह सुनिश्चित होगा कि बार और बेंच की योग्य महिला उम्मीदवारों के नामों पर पूरी निष्पक्षता से विचार किया जाए।
कानून आसान भाषा में
भारत में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति एक विशेष व्यवस्था के जरिए की जाती है, जिसे कॉलेजियम (Collegium) कहा जाता है। इस कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं, जो विचार-विमर्श करके नियुक्ति के लिए सरकार को नामों की सिफारिश भेजते हैं।
इसी तरह, किसी वकील को 'वरिष्ठ अधिवक्ता' (Senior Advocate) का दर्जा देने की प्रक्रिया में अदालत के सामने उनकी योग्यता, अनुभव और प्रतिष्ठा का मूल्यांकन किया जाता है। चूंकि ये नियुक्तियां और पदनाम सामान्य प्रतियोगी लिखित परीक्षाओं के बजाय संस्थागत चर्चाओं के आधार पर तय होते हैं, इसलिए इसके मानक कभी-कभी व्यक्तिपरक हो सकते हैं।
जब निर्णय लेने वाली प्रक्रिया में विविधता या स्पष्ट रूप से मापने योग्य पैमानों की कमी होती है, तो चयन के पुराने ढर्रे ही हावी रहने की आशंका रहती है। चयन समितियों में विभिन्न वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना अनजाने में होने वाले पक्षपात को दूर करने और सभी के लिए निष्पक्ष मूल्यांकन की गारंटी देने का एक प्रभावी तरीका माना जाता है।
आम लोगों पर असर
न्यायपालिका का स्वरूप कैसा है, इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि आम नागरिक न्याय प्रणाली को किस नजरिए से देखते हैं। एक ऐसी बेंच जिसमें पुरुषों और महिलाओं दोनों का संतुलित प्रतिनिधित्व हो, कानूनी व्यवस्था की निष्पक्षता में जनता का भरोसा मजबूत करती है।
जब देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं और बड़ी संख्या में छात्राएं लॉ की पढ़ाई कर रही हैं, तो अदालतों में महिला जजों की मौजूदगी आम वादियों (Litigants) को आश्वस्त करती है। संवैधानिक, दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई करते हुए महिला जजों को देखना सभी नागरिकों के लिए समान अवसर के सिद्धांत को मजबूती देता है।
इसके अलावा, योग्य महिला वकीलों और न्यायिक अधिकारियों के लिए रास्ते खुलने से देश भर के युवा कानूनी पेशेवरों का मनोबल बढ़ता है। बेहतर प्रतिनिधित्व यह तय करता है कि देश की नीतियों और कानूनों को दिशा देने वाले फैसलों में महिलाओं के जीवन के अनुभव और उनके कानूनी दृष्टिकोण पूरी तरह शामिल हों।
ऐसी स्थिति में क्या करें
यदि आप या आपका संगठन किसी पेशेवर क्षेत्र में संस्थागत सुधारों, बेहतर प्रतिनिधित्व या पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन प्रक्रियाओं को चुनौती देने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं, तो इन कानूनी कदमों का ध्यान रखें:
- स्पष्ट रिकॉर्ड रखें: अपनी योग्यता, मेरिट रैंकिंग, कार्य अनुभव और पेशेवर उपलब्धियों से जुड़े सभी दस्तावेजों को हमेशा व्यवस्थित और सुरक्षित रखें।
- तथ्यों और आंकड़ों पर भरोसा करें: संस्थागत निष्पक्षता या पदोन्नति में असंतुलन का मुद्दा उठाते समय अपने दावों को साबित करने के लिए हमेशा प्रमाणित तुलनात्मक आंकड़े जुटाएं।
- आंतरिक मंचों का इस्तेमाल करें: अपने सुझाव और प्रत्यावेदन (Representation) अधिकृत संस्थागत निकायों, बार एसोसिएशनों या नियामक समितियों के समक्ष औपचारिक रूप से रखें।
- समय पर कानूनी सलाह लें: प्रशासनिक या संवैधानिक विकल्पों के तहत सही कानूनी उपायों को समझने के लिए बिना किसी देरी के किसी योग्य वकील से संपर्क करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम क्या है?
कॉलेजियम भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों की एक समिति है, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की पदोन्नति और नियुक्ति की सिफारिश करती है।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कॉलेजियम को लेकर क्या चिंता जताई?
उन्होंने रेखांकित किया कि कॉलेजियम में पुरुषों का दबदबा है और सुप्रीम कोर्ट के 35 जजों में से केवल 3 महिलाएं हैं। उन्होंने अधिक निष्पक्ष प्रतिनिधित्व के लिए कॉलेजियम बैठकों में महिला जज को आमंत्रित सदस्य बनाने का सुझाव दिया।
प्रतियोगी परीक्षाओं और कॉलेजियम चयन में जज ने क्या अंतर बताया?
उन्होंने कहा कि वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं वाली शुरुआती न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक होती है, लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर, जहां चयन कॉलेजियम की सिफारिशों पर निर्भर करता है, यह हिस्सेदारी तेजी से घट जाती है।
न्यायिक सेवा में महिलाओं के अच्छे प्रवेश को लेकर किन राज्यों का जिक्र किया गया?
जस्टिस भुइयां ने असम, मेघालय, राजस्थान, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों का उल्लेख किया, जहां ग्रेड III न्यायिक सेवा में महिलाओं की बड़ी भागीदारी है, जिसमें अकेले असम में यह आंकड़ा 65 प्रतिशत तक है।