⚡ त्वरित सारांश
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने PMLA पुनर्विचार याचिकाओं और जजों की नियुक्ति में देरी से जुड़े मामलों में शीर्ष अदालत के आंतरिक घटनाक्रम की जानकारी साझा की है। उन्होंने खुलासा किया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने मनी लॉन्ड्रिंग पुनर्विचार याचिकाओं में बीच का रास्ता निकालने का सुझाव दिया था। जस्टिस कौल ने यह भी बताया कि कॉलेजियम की सिफारिशों पर सरकार से जवाबदेही तय करने वाला एक अहम मामला उनकी बेंच से हटाकर दूसरी जगह भेज दिया गया था।
📌 मुख्य बातें
- जस्टिस कौल ने बताया कि तत्कालीन सीजेआई चंद्रचूड़ ने PMLA पुनर्विचार याचिकाओं पर बीच का रास्ता अपनाने का सुझाव दिया था।
- पूर्व जज ने अपने न्यायिक रुख से समझौता करने से इनकार किया और तय कार्यक्रम के अनुसार सुनवाई आगे बढ़ाई।
- कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति में देरी से जुड़ा एक अहम मामला जस्टिस कौल की बेंच से हटा दिया गया था।
📋 केस एक नज़र में
| अदालत | सुप्रीम कोर्ट |
|---|---|
| बेंच | जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी |
| केस | Petitions seeking reconsideration of Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India |
| तारीख | 2026-10-25 |
| कानून / मुद्दा | धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) |
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने शीर्ष अदालत के सामने आए कई अहम और संवेदनशील मामलों में अंदरूनी बातचीत को लेकर बड़े खुलासे किए हैं। अपनी आगामी किताब 'विदाउट फियर ऑर फेवर' (Without Fear or Favour) के सिलसिले में बात करते हुए रिटायर्ड जज ने बताया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) डीवाई चंद्रचूड़ ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की समीक्षा से जुड़ी याचिकाओं पर बीच का रास्ता निकालने का सुझाव दिया था। उन्होंने यह भी साझा किया कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति में केंद्र सरकार की ओर से हो रही देरी का एक अहम मामला उनकी बेंच से हटा दिया गया था।
ये खुलासे देश की सबसे बड़ी अदालत के कामकाज और उसके प्रशासनिक संचालन पर रोशनी डालते हैं। आम नागरिकों के लिए बेंच का गठन और जजों की स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही व्यवस्था तय करती है कि संवैधानिक अधिकार, जमानत (Bail) के नियम और सरकारी शक्तियों के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता का संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के 2022 के उस फैसले की समीक्षा से जुड़ा है, जो विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (Vijay Madanlal Choudhary versus Union of India) मामले में दिया गया था। उस फैसले में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के कड़े प्रावधानों को सही ठहराया गया था, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ED) को मिली तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी की शक्तियां और जमानत की बेहद कड़ी शर्तें शामिल थीं।
इस फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए कई पुनर्विचार याचिकाएं (Review Petitions) दायर की गईं। इन मामलों की सुनवाई के लिए जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता में तीन जजों की एक बेंच बनाई गई, जिसमें जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी शामिल थे। उसी दौरान, जस्टिस कौल उस मामले की सुनवाई भी कर रहे थे, जिसमें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (Collegium) द्वारा उच्च अदालतों में जजों की नियुक्ति की सिफारिशों पर केंद्र सरकार से तय समयसीमा के भीतर कदम उठाने की मांग की गई थी।
जस्टिस कौल ने याद किया कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले की पुनर्विचार सुनवाई शुरू होने से ठीक पहले, उन्हें और जस्टिस खन्ना को मुख्य न्यायाधीश के चैंबर में बुलाया गया था। इस दौरान मामले की संवेदनशीलता और इस बात पर चर्चा हुई कि क्या सुनवाई को आगे बढ़ाना चाहिए।
कोर्ट ने क्या कहा
उस बैठक का जिक्र करते हुए जस्टिस कौल ने कहा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने सावधानी बरतने और कड़ा रुख अपनाने के बजाय एक संतुलित समझौता (बीच का रास्ता) निकालने का सुझाव दिया था। जस्टिस कौल का मानना था कि दो दशकों से अधिक के न्यायिक करियर के बाद तय सुनवाई से पीछे हटने से उनकी साख और न्यायिक कर्तव्य को ठेस पहुंचेगी। उन्होंने कहा:
“अपने न्यायिक करियर में मैंने कभी भी किसी तरह का बीच का रास्ता नहीं चुना। अगर मुझे किसी मामले में कुछ सही लगता है, तो मैं उसी पर आगे बढ़ा हूं।”
जस्टिस कौल ने बताया कि बैठक खत्म होते ही वह और जस्टिस खन्ना सीधे कोर्ट रूम पहुंचे और तय सुनवाई शुरू की। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार ने बार-बार सुनवाई टालने (Adjournment) की मांग की ताकि मामला उनके रिटायरमेंट तक खिंच जाए, और आखिरकार उनके पद छोड़ने से कुछ समय पहले ही वह विशेष बेंच भंग हो गई।
जजों की नियुक्ति वाले मामले को अपनी बेंच से हटाए जाने पर जस्टिस कौल ने बताया कि जब वह कार्यपालिका पर तय समयसीमा का पालन कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी यह केस अचानक उनकी लिस्ट से हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि ऐसा लगा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर इस मामले को लेकर कोई दबाव था, हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह दबाव किसकी तरफ से था।
कानून आसान भाषा में
इस पूरे मामले में दो प्रमुख कानूनी बिंदु शामिल हैं: पहला, विशेष आर्थिक कानूनों के तहत जमानत (Bail) के नियम और दूसरा, न्यायपालिका के प्रशासन की स्वतंत्रता। सामान्य आपराधिक प्रक्रिया में अदालतें न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों को देखकर जमानत देती हैं। लेकिन PMLA जैसे कानूनों में दोहरी शर्तें (Twin Conditions) होती हैं, जिन्हें पूरा किए बिना अदालत आरोपी को रिहा नहीं कर सकती, जिससे जमानत पाना काफी कठिन हो जाता है।
पुनर्विचार याचिकाओं में इन्हीं कड़े प्रावधानों और ईडी की व्यापक जांच शक्तियों को चुनौती दी गई थी। जब कोई नागरिक या वकील सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर सवाल उठाता है, तो अदालत को यह देखना होता है कि कानून के प्रावधान संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। जब ऐसी सुनवाइयां टलती हैं या बेंच भंग हो जाती हैं, तो पुराने कड़े नियम बिना समीक्षा के लागू रहते हैं।
इसके अलावा, कॉलेजियम (Collegium) व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करते हैं। जब अदालत न्यायिक आदेशों के जरिए इन नियुक्तियों की निगरानी करती है, तो उसका मकसद अदालतों में खाली पदों को भरना होता है ताकि मामलों का बैकलॉग कम हो सके।
आम लोगों पर असर
इन बातों का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है क्योंकि न्याय व्यवस्था पूरी तरह से अदालतों के निडर और पारदर्शी कामकाज पर टिकी है। जब कड़े कानूनों की संवैधानिक वैधता प्रक्रियात्मक देरी या बेंच के बदलने के कारण अनसुलझी रह जाती है, तो उन कानूनों के तहत जांच का सामना कर रहे आम लोगों को अपनी व्यक्तिगत आजादी के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
इसके साथ ही, जब अदालतों में जजों की नियुक्ति में देरी होती है और समयसीमा तय करने के न्यायिक प्रयासों में बाधा आती है, तो पद खाली रह जाते हैं। इस वजह से देश भर में दीवानी (Civil), पारिवारिक और आपराधिक मामलों के निपटारे में देरी होती है और आम नागरिकों को न्याय के लिए बरसों इंतजार करना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में क्या करें
- विशेष आपराधिक कानूनों के तहत जांच का सामना करते समय चार्जशीट, अदालती आदेश और समन (Summons) का पूरा रिकॉर्ड संभालकर रखें।
- उच्च अदालतों में पुनर्विचार याचिका या अपील (Appeal) दायर करते समय तय कानूनी समयसीमा का कड़ाई से पालन करें।
- ऐसे अनुभवी कानूनी सलाहकारों की मदद लें जो उच्च अदालतों में सांविधिक आदेशों को चुनौती देने की प्रक्रिया से भली-भांति परिचित हों।
- अदालती कार्यवाही के दौरान किसी अनौपचारिक आश्वासन के बजाय हमेशा आधिकारिक और दस्तावेजी फाइलों पर ही भरोसा करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सुप्रीम कोर्ट में PMLA फैसले से जुड़ा क्या विवाद था?
सुप्रीम कोर्ट 2022 के विजय मदनलाल चौधरी मामले के फैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई कर रहा था। उस फैसले में ईडी की तलाशी, जब्ती, गिरफ्तारी की शक्तियों और जमानत की बेहद कड़ी शर्तों को बरकरार रखा गया था।
जस्टिस कौल ने मुख्य न्यायाधीश के साथ हुई बैठक के बारे में क्या बताया?
जस्टिस कौल ने कहा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने PMLA याचिकाओं पर बीच का रास्ता निकालने का सुझाव दिया था। जस्टिस कौल ने इससे इनकार कर दिया और तय कार्यक्रम के तहत कोर्ट में सुनवाई की।
जजों की नियुक्ति का मामला जस्टिस कौल की बेंच से क्यों हटाया गया?
जस्टिस कौल के अनुसार, जब वह कॉलेजियम की सिफारिशों पर सरकार के लिए सख्त समयसीमा लागू करने की कोशिश कर रहे थे, तब यह केस हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि ऐसा लगा कि मुख्य न्यायाधीश पर इस मामले में कुछ दबाव था।
PMLA मामले की सुनवाई कर रही बेंच का क्या हुआ?
जस्टिस कौल के अनुसार, सरकार ने कई बार तारीख आगे बढ़वाई ताकि मामला उनके रिटायरमेंट तक टल जाए। नतीजतन, उनके रिटायर होने से कुछ समय पहले ही वह बेंच भंग हो गई।