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⚖️ सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया 📅 25 अक्टूबर 2026 ⏱ 5 मिनट में पढ़ें

जजों की नियुक्ति पर जस्टिस कौल का बड़ा खुलासा: कॉलेजियम से पहले सरकार से चर्चा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले सरकार से जजों के नामों पर अनौपचारिक सहमति लेने पर गहरी चिंता जताई।

⚡ त्वरित सारांश

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने खुलासा किया कि पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ कॉलेजियम की बैठक से पहले ही संभावित उम्मीदवारों के नामों पर सरकार से अनौपचारिक बातचीत करते थे। जस्टिस कौल ने इस प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए इसे सरकार से अनुचित पूर्व-स्वीकृति लेने जैसा बताया। उन्होंने चेताया कि प्रशासनिक मामलों में कार्यपालिका के प्रति अत्यधिक नरमी बरतना भविष्य के मुख्य न्यायाधीशों के लिए एक गलत मिसाल कायम करता है।

📌 मुख्य बातें

  1. जस्टिस कौल ने कहा कि सीजेआई चंद्रचूड़ कॉलेजियम की चर्चा से पहले ही सरकार से न्यायिक उम्मीदवारों पर बात करते थे।
  2. औपचारिक बैठकों से पहले अनौपचारिक पूर्व-मंजूरी लेना गलत संदेश भेजता है, ऐसा जस्टिस कौल का मानना है।
  3. इस चलन से कार्यपालिका की उम्मीदें बढ़ जाती हैं, जिससे कम कार्यकाल वाले भविष्य के सीजेआई के लिए मुश्किलें खड़ी होंगी।

📋 केस एक नज़र में

अदालतसुप्रीम कोर्ट
तारीख2026-10-25
कानून / मुद्दान्यायिक नियुक्तियां और कॉलेजियम विचार-विमर्श

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने भारत में शीर्ष न्यायिक नियुक्तियों की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर अहम खुलासे किए हैं। अपने आगामी संस्मरण से जुड़े एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ कॉलेजियम की आधिकारिक बैठक में निर्णय लेने से पहले ही सरकार के साथ संभावित उम्मीदवारों के नामों पर अनौपचारिक बातचीत करते थे।

यह खुलासा न्यायपालिका (Judiciary) और कार्यपालिका (Executive) के बीच शक्तियों के बंटवारे को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। जस्टिस कौल ने इन चर्चाओं पर गहरी चिंता जताई और इसे निर्णय के बाद होने वाले वैध परामर्श के बजाय कार्यपालिका से अनपेक्षित पूर्व-स्वीकृति लेने की कोशिश करार दिया।

पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम (Collegium) व्यवस्था के जरिए होती है, जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीश मिलकर विचार-विमर्श करते हैं और उम्मीदवारों का चयन करते हैं। अपने आने वाले संस्मरण, 'Without Fear Or Favour' में जस्टिस कौल ने एक घटना का जिक्र किया, जहां पांच नामों पर सभी सदस्यों की सहमति बन चुकी थी, लेकिन चीफ जस्टिस ने अंतिम चरण में एक छठा नाम जोड़ने की कोशिश की।

उस बैठक के दौरान, चीफ जस्टिस ने जस्टिस कौल को अलग ले जाकर पूछा कि क्या उन्हें प्रस्तावित नियुक्तियों पर सरकार का रुख जानने के लिए फोन करना चाहिए। जस्टिस कौल ने इस सुझाव का कड़ा विरोध किया और कहा कि आंतरिक चर्चा के दौरान ऐसी अनौपचारिक जांच पूरी तरह से अनुचित है।

जस्टिस कौल ने बताया कि कॉलेजियम के अन्य सदस्यों ने भी उस अंतिम नाम को जोड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि उस अतिरिक्त उम्मीदवार को लेकर सरकार के साथ पहले से ही कोई अनौपचारिक सहमति या मंजूरी ली जा चुकी थी।

कोर्ट ने क्या कहा

चीफ जस्टिस के प्रशासनिक फैसलों पर बात करते हुए, जस्टिस कौल ने संस्था द्वारा औपचारिक सिफारिश भेजे जाने के बाद होने वाले कानूनी परामर्श और जजों के मिलने से पहले ली जाने वाली अग्रिम मंजूरी के बीच का अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि यह अनौपचारिक चलन पहले और बाद में भी हुआ, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

"कॉलेजियम द्वारा औपचारिक विचार-विमर्श से पहले ही सरकार की रजामंदी लेना... यह पूरी तरह गलत संदेश देता है।"

जस्टिस कौल ने कहा कि चीफ जस्टिस के तौर पर दो साल का लंबा कार्यकाल प्रक्रियात्मक सीमाओं की रक्षा करने की जिम्मेदारी लेकर आता है। यदि कोई प्रमुख इस तरह पूर्व-परामर्श की आदत बना लेता है, तो उनके बाद आने वाले मुख्य न्यायाधीश, जिनका कार्यकाल छोटा होता है, उनके लिए कार्यपालिका के ऐसे दबावों और अपेक्षाओं का विरोध करना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

न्यायिक दक्षता पर जस्टिस कौल ने माना कि उनके साथी न्यायाधीश के पास असाधारण बौद्धिक क्षमता थी। हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रशासनिक निर्णयों और न्यायिक नियुक्तियों के मामले में पूर्व चीफ जस्टिस का रुख सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा लचीला था।

पूर्व जज ने अपने कार्यकाल के दौरान अन्य प्रशासनिक असहमतियों का भी जिक्र किया। इनमें जजों की नियुक्ति से जुड़े मामलों को उनकी बेंच से हटाना और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के एक फैसले पर पुनर्विचार के दौरान 'बीच का रास्ता' निकालने के सुझाव शामिल थे।

कानून आसान भाषा में

भारत की उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम व्यवस्था के इर्द-गिर्द घूमती है। यह वरिष्ठ जजों का एक आंतरिक पैनल होता है जो उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश करता है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कार्यपालिका के दखल से सुरक्षित रखना है।

स्थापित नियमों के तहत, जज आपस में विचार-विमर्श करते हैं, सिफारिशों को अंतिम रूप देते हैं और फिर औपचारिक रूप से सूची सरकार को भेजते हैं। कार्यपालिका का काम केवल इनपुट की समीक्षा करना, बैकग्राउंड चेक करना और नामों को मंजूरी देना या आपत्तियों के साथ लौटाना होता है।

जस्टिस कौल ने जिस मुद्दे को उठाया है, वह है सरकार से बातचीत का समय और तरीका। जब औपचारिक आंतरिक सहमति से पहले ही ऐसी चर्चाएं होने लगती हैं, तो यह कानूनी परामर्श के बजाय एक अनौपचारिक पूर्व-मंजूरी बन जाती है, जिससे संस्था की स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत कमजोर होती है।

आम लोगों पर असर

जजों के चयन की प्रक्रिया आम नागरिकों को सीधे प्रभावित करती है, क्योंकि एक स्वतंत्र न्यायपालिका ही उनके संवैधानिक अधिकारों की अंतिम संरक्षक होती है। जब कोई नागरिक सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो उसे एक निष्पक्ष और दबाव-मुक्त पीठ की उम्मीद होती है।

यदि चयन प्रक्रिया में जजों के मतदान से पहले ही सरकार को अनौपचारिक वीटो देने की छूट मिल जाएगी, तो न्यायिक नियुक्तियों की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा डगमगा सकता है। एक पारदर्शी और सैद्धांतिक प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि जजों का चयन केवल योग्यता और संवैधानिक उपयुक्तता के आधार पर हो।

इसके अलावा, प्रशासनिक पारदर्शिता न्यायिक संस्थानों में स्थिरता बनाए रखती है। मजबूत नियुक्ति प्रक्रिया देश भर के उन आम वादियों के अधिकारों की रक्षा करती है जो अदालत से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद रखते हैं।

ऐसी स्थिति में क्या करें

हालांकि आम नागरिक न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल नहीं होते, लेकिन किसी भी प्रशासनिक या न्यायिक संस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है। यदि आपको किसी प्रशासनिक प्रक्रिया या संस्थागत कामकाज में अनियमितता का सामना करना पड़े, तो इन बातों का ध्यान रखें:

  • सभी बातचीत, बैठकों और आधिकारिक दस्तावेजों का सिलसिलेवार और व्यवस्थित रिकॉर्ड रखें।
  • अनौपचारिक व्यवस्थाओं के बजाय स्थापित नियमों और औपचारिक निर्णय प्रक्रियाओं का पालन करने पर जोर दें।
  • जब भी नियमों के उल्लंघन से आपके कानूनी अधिकारों या किसी संस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़े, तो तुरंत कानूनी सलाह लें।
  • यदि प्रक्रियात्मक गड़बड़ियों को चुनौती देनी हो या उन्हें रिकॉर्ड पर लाना हो, तो तय समय सीमा के भीतर कानूनी कदम उठाएं।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जस्टिस कौल ने न्यायिक नियुक्तियों को लेकर क्या चिंता जताई?

जस्टिस कौल ने कहा कि पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले ही सरकार से संभावित जजों के नामों पर अनौपचारिक चर्चा करते थे। उन्होंने इसे सरकार से पूर्व-मंजूरी लेने जैसा अनुचित कदम बताया।

कानूनी परामर्श और पूर्व-मंजूरी में क्या अंतर है?

परामर्श तब होता है जब कॉलेजियम औपचारिक रूप से नामों का चयन कर सरकार को सिफारिश भेजता है। वहीं पूर्व-मंजूरी का मतलब है कि कॉलेजियम के सदस्यों के आपस में निर्णय लेने से पहले ही सरकार की रजामंदी लेना।

जस्टिस कौल के अनुसार इस चलन से भविष्य के चीफ जस्टिस को क्या नुकसान होगा?

उन्होंने चेताया कि लंबे कार्यकाल वाले चीफ जस्टिस अगर ऐसी परंपरा शुरू करते हैं, तो सरकार हमेशा पहले से मंजूरी की उम्मीद रखेगी। इससे छोटे कार्यकाल वाले नए सीजेआई के लिए कार्यपालिका के दखल का विरोध करना कठिन हो जाएगा।

क्या जस्टिस कौल ने पूर्व चीफ जस्टिस के अदालती फैसलों की आलोचना की?

नहीं, जस्टिस कौल ने उनकी असाधारण न्यायिक और बौद्धिक क्षमता की सराहना की। उनकी आलोचना सिर्फ प्रशासनिक मामलों तक सीमित थी, जहां उनके मुताबिक सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरमी दिखाई गई।

📖 कानूनी शब्दों के मतलब

Collegium (कॉलेजियम)वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक आंतरिक समूह जो उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करता है।
Pre-approval (पूर्व-मंजूरी)जजों की आधिकारिक बैठक और चर्चा से पहले ही सरकार से ली जाने वाली अनौपचारिक सहमति।
Tenure (कार्यकाल)वह समयावधि जिसके दौरान कोई व्यक्ति अपने आधिकारिक पद पर सेवा देता है।
Administrative side (प्रशासनिक पक्ष)अदालत की वह जिम्मेदारियां जो मुकदमों की सुनवाई के बजाय आंतरिक कामकाज, रोस्टर तय करने और नियुक्तियों से जुड़ी होती हैं।
⚠️ यह लेख एक सरल सारांश है, केवल सामान्य जानकारी के लिए। इसे कानूनी सलाह न समझें — अपने मामले के लिए वकील से सलाह लें।
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